Thursday , 3 December 2020

Bhagwan Singh Kadayan के कुछ विचार

Bhagwan Singh Kadian
Bhagwan Singh Kadian

भगवान सिंह कादयान – विष्णु के मन्दिर की चार बार, शंकर के मन्दिर की आधी बार, देवी के मन्दिर की एक बार, सूर्य के मन्दिर की सात बार और श्रीगणेश के मन्दिर की तीन बार परिक्रमा करनी चाहिये ।- नारदपुराण
जिसके घरसे अतिथि निराश होकर लौट जाता है, वह उसे अपना पाप देकर बदलेमें उसका पुण्य लेकर चला जाता है ।– विष्णुस्मृति
जूता पहने हुए जमीनपर नहीं बैठना चाहिये।– स्कन्दपुराण
अब मैं पुनः पाप नहीं करुँगा- यह पापका असली प्रायश्चित्त है ।
बुद्धिमान्‌ मनुष्यको राजा, ब्राह्मण, वैध, मूर्ख, मित्र, गुरु और प्रियजनोंके साथ विवाद नहीं करना चाहिये।- चाणक्यसुत्र ३५२
राम-राम!
निद्रा भंग करना , भागवत कथा में विघ्न डालना , पति-पत्नी में भेद पैदा करना, माता -पुत्र में भेद पैदा करना ब्रह्महत्या के तुल्य पाप है|
दो अक्षर की “मौत”औरतीन अक्षर के “जीवन” में ढाई अक्षरका “दोस्त” हमेंशा बाज़ी मार जाता हैं..क्या खुब लिखा है किसी ने …
“बक्श देता है ‘खुदा’ उनको, … !जिनकी ‘किस्मत’ ख़राब होती है … !!
वो हरगिज नहीं ‘बक्शे’ जाते है, … !जिनकी ‘नियत’ खराब होती है… !!”
न मेरा ‘एक’ होगा, न तेरा ‘लाख’ होगा, … !न ‘तारिफ’ तेरी होगी, न ‘मजाक’ मेरा होगा … !!
गुरुर न कर “शाह-ए-शरीर” का, … !मेरा भी ‘खाक’ होगा, तेरा भी ‘खाक’ होगा … !!
जिन्दगी भर ‘ब्रांडेड-ब्रांडेड’ करनेवालों … !याद रखना ‘कफ़न’ का कोई ब्रांड नहीं होता … !!
कोई रो कर ‘दिल बहलाता’ है … !और कोई हँस कर ‘दर्द’ छुपाता है … !!
क्या करामात है ‘कुदरत’ की, … !’ज़िंदा इंसान’ पानी में डूब जाता है और ‘मुर्दा’ तैर केदिखाता है … !!
‘मौत’ को देखा तो नहीं, पर शायद ‘वो’ बहुत”खूबसूरत” होगी, … !”कम्बख़त” जो भी ‘उस’ से मिलता है,”जीना छोड़ देता है” … !!
‘ग़ज़ब’ की ‘एकता’ देखी “लोगों की ज़मानेमें” … !’ज़िन्दों’ को “गिराने में” और ‘मुर्दों’ को “उठानेमें” … !!
‘ज़िन्दगी’ में ना ज़ाने कौनसी बात “आख़री”होगी, … !ना ज़ाने कौनसी रात “आख़री” होगी ।
मिलते, जुलते, बातें करते रहो यार एक दूसरे से ना जाने कौनसी “मुलाक़ात” “आख़री होगी
मिटटी का जिस्म लेकर, पानी के घर मै हूँ ..!!मंजिल है मौत मेरी, हर पल सफर मै हूँ…!!!!

लोग जलते रहे दूसरे की मुस्कान पर, 
मैंने दर्द की अपने नुमाइश न की,
जब,जहाँ, मिला अपना लिया, 
जो न मिला उसकी ख्वाहिश न की.
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खुद पर भरोसा करने का 
हुनर सीख लो,
सहारे कितने भी भरोसेमंद हो, 
एक दिन साथ छोड़ ही जाते हैं. 
बहुत ही सुंदर पंक्तियां  है  ….
जब भी अपनी शख्शियत पर अहंकार हो,एक फेरा शमशान का जरुर लगा लेना।
और….
जब भी अपने परमात्मा से प्यार हो,किसी भूखे को अपने हाथों से खिला देना।
जब भी अपनी ताक़त पर गुरुर हो,एक फेरा वृद्धा आश्रम का लगा लेना।
और….
जब भी आपका सिर श्रद्धा से झुका हो,अपने माँ बाप के पैर जरूर दबा देना।
जीभ जन्म से होती है और मृत्यु तक रहती है क्योकि वो कोमल होती है.
दाँत जन्म के बाद में आते है और मृत्यु से पहले चले जाते हैं… क्योकि वो कठोर होते है।
छोटा बनके रहोगे तो मिलेगी हरबड़ी रहमत…बड़ा होने पर तो माँ भी गोद से उतारदेती है..किस्मत और पत्नीभले ही परेशान करती है लेकिनजब साथ देती हैं तोज़िन्दगी बदल देती हैं.।।
“प्रेम चाहिये तो समर्पण खर्च करना होगा।
विश्वास चाहिये तो निष्ठा खर्च करनी होगी।
साथ चाहिये तो समय खर्च करना होगा।
किसने कहा रिश्ते मुफ्त मिलते हैं ।मुफ्त तो हवा भी नहीं मिलती ।
एक साँस भी तब आती है,जब एक साँस छोड़ी जाती है!!”?.:
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नंगे पाँव चलते “इन्सान” को लगता हैकि “चप्पल होते तो  अच्छा होता”बाद मेँ……….“साइकिल होती तो कितना अच्छा होता”उसके बाद में………“मोपेड होता तो थकान नही लगती”बाद में………“मोटर साइकिल होती तो बातो-बातो मेँरास्ता कट जाता”
फिर ऐसा लगा की………“कार होती तो धूप नही लगती”����������������������������फिर लगा कि,“हवाई जहाज होता तो इस ट्रैफिक का झंझटनही होता”�����������जब हवाई जहाज में बैठकर नीचे हरे-भरे घास के मैदानदेखता है तो सोचता है,कि “नंगे पाव घास में चलता तो दिलको कितनी “तसल्ली” मिलती”…..���” जरुरत के मुताबिक “जिंदगी” जिओ – “ख्वाहिश”….. केमुताबिक नहीं………���क्योंकि ‘जरुरत’तो ‘फकीरों’ की भी ‘पूरी’ हो जाती है, और‘ख्वाहिशें’….. ‘बादशाहों ‘ की भी “अधूरी” रह जाती है”…..���“जीत” किसके लिए, ‘हार’ किसके लिए‘ज़िंदगी भर’ ये ‘तकरार’ किसके लिए…����जो भी ‘आया’ है वो ‘जायेगा’ एक दिनफिर ये इतना “अहंकार” किसके लिए…���ए बुरे वक़्त !ज़रा “अदब” से पेश आ !!“वक़्त” ही कितना लगता है“वक़्त” बदलने में………���मिली थी ‘जिन्दगी’ , किसी के‘काम’ आने के लिए…..पर ‘वक्त’ बीत रहा है , “कागज” के “टुकड़े” “कमाने” के लिए………

Regards,
Bhagwan Singh Kadian

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