Jat Pariwar

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मेहरिया जाट Mehria jat is very old gotra
mehriya jat

मेहरिया काफी पुराना और प्रसिद्ध गोत्र है। राजस्थान में मेहरिया जाटों का काफी सम्मान के तौर पर देखा जाता है। इस गोत्र को ऊंचा गोत्र समझा जाता है। जानकारी के अनुसार शिवि लोगों की बहुत सी शाखाएं है। इनहीं में से एक मेहरिया जाट गोत्र के लोगों की भी शाखा है। अगर हम इतिहास की पुस्तके देखे तो पता चलता है कि शिवि लोगों की शासन व्यवस्था की काफी प्रशंसा की गई है जिससे पता चलता है कि ये लोग पहले काफी अच्छे राजा हुआ करते थे। तथा इनका राज्य काफी व्यवस्थीत होता था। जानकारी के अनुसार उनके मंत्रिमंडल में सेनापति को वीरभद्र के नाम से जाना जाता था।

मालमंत्री पद से निकला है मेहरिया जाट गोत्र

जब राजस्थान की कुछ पुस्तकों को देखा गया तो पता चला कि मेहरिया जाटों को मेहीवाल, माहे, माहित, महरिया, महार आदि नामों से भी जाना जाता है।
मेहरिया गोत्र के बारे में जब जानकारी प्राप्त करने के लिए इतिहास की पुस्तकों को देखा गया तो पता चला कि मेहरिया गोत्र मालमंत्री के पद से निकला है। शिवि राज्य में रेवेन्यू मिनिस्टर (मालमंत्री ) को महि हेरक कहा जाता है जो समय के साथ महेरिया बन गया। इसी को आज कल लोग महेरिया के नाम से जानते है। मेहरिया जाटों का एक गांव कूदन बहुत प्रसिद्ध है। जानकारी के अनुसार कूदन को भीमजी नाम के एक प्रसिद्ध महेरिया जाट ने आबाद किया था। उसी की तीसरी पीढी में रामनारायण जी हुए। रामनारायण जी के बड़े पुत्र चौधरी जीवनराम जी थे जो गणेशराम जी के बड़े भाई के रूप में जाने जाते है।

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सीकर वाटी में राव राजा के प्रिय चौधरी नाथाराम महरिया थे। इसी परंपरा को उनके बेटे शिवबक्स महरिया ने निभाया। शिवबक्स कूदन के बेताज बादशाह थे। गांव में सुण्डा गोत्र के जाट अधिक संख्या में हैं। महरिया और सुंडा में हमेशा प्रतिस्पर्धा चलती रही है। लेकिन शिवबक्स महरिया के ऊंचे रसूख के कारण वे सुंडा लोगों पर भारी पड़ रहे थे। महरिया एक पोली (दरवाजा) के भीतर रहते थे, जिसे मेहरिया पोली कहा जाता था। आज भी इस पोली के विशेष स्मारक के रुप में सुरक्षित हैं। विशेष रुप से नाथाराम महरिया गढों और महलों में प्रसिद्धि प्राप्त करते रहे हैं। किसान वर्ग में रहते हुए भी मेहरिया परिवार किसानों से अलग रहते एवं उनमें उच्च वर्ग की भावना थी।

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महरिया परिवारों का आदि पुरुष किसना मेहरिया थे, जिनकी छतरी अभी भी कूदन में मौजूद है। किसना राम के दो बेटे थे – 1. भीमाराम और 2.बोयत राम। भींवाराम के चार पुत्र थे जिनके नाम भानाराम, मोटाराम, गुमानाराम और न्योला राम थे। इन चारों ने 25-25 रुपये खर्च कर किसनाराम की छतरी बनाई थी। चारों भाइयों की चार हवेलियां काफी पुरानी हैं जिससे इस परिवार की समृद्धि का पता लगता है। कूदन के महरिया उन्हीं की वंशबेल हैं।

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अगर हम इस गोत्र के लोगों के निवास स्थान की बात करें तो पता चलता है कि ये लोग पंजाब, मध्यप्रदेश और राजस्थान में निवास करते है जबकि इस गोत्र के कुछ गांव अफगानिस्तान में भी मिलते है लेकिन वे लोग वहां मुस्लिम जाट के नाम से जाने जाते है।

अब अगर हम राजस्थान में मेहरिया जाटों के गांव की बात करें तो पता चलता है कि राजस्थान के सीकर जिले में दांतारू, कंसार्दा, कुंदर, मंडीवाल की ढाणी, नरोदरा, सिंगोद्रा, यलसर आदि गांवों के नाम प्रमुख रूप से लिये जाते है जबकि राजस्थान के ही हनुमानगढ़ जिले के गांवों में मेहरिया देवीदास जोकसर, महराणा, साहुवाला, गुंजासरी, रतुसर, महरिया आदि गांवों के नाम प्रमुख रूप से लिये जाते है जबकि राजस्थान के ही गंगानगर में साहुवाला गंगानगर में इस गोत्र के कुछ लोग निवास करते है। वहीं राजस्थान के चूरू जिले में परिहार, रतुसर, सुजानगढ, बीकानेर में बीकानेर गांव, जयपुर जिले में डाबरी रामपुरा, दूदू आदि गांवों के नाम लिये जाते है।

जयपुर शहर में खातीपुरा, नागौर जिले में बदर धींगसरा, हरसोलाव, हीरान खुरी, इंद्रवद, धोलेराव कलां , टोंक जिले में महाआर्य इस गोत्र के प्रमुख जाटों के रूप में देखा जाता है। इसके अलावा भी भारत के अन्य राज्यों में इस गोत्र के लोग मिलते है जैसे मध्यप्रदेश में आत्माराम, भोपाल, पंजाब के पटियाला में राजपुरा तहसील का गांव का नाम लिया जाता है। जैसा की हम आपको पहले भी बता चुके है कि पाकिस्ताम और अफगानिस्तान में भी इस गोत्र के जाटों के गांव मिलते है।

मध्य प्रदेश में वितरण

आत्माराम (हरदा), भोपाल,

पंजाब में वितरण
माहे जाट पंजाब में अमृतसर, शाहपुरा जिलों में पाए जाते हैं।

पटियाला जिले में गाँव
महरिया पंजाब में पटियाला जिले में राजपुरा तहसील का गाँव है।
पाकिस्तान में वितरण
1911 की जनगणना के अनुसार महार प्रमुख मुस्लिम जाट वंश थे
डेरा गाजी खान जिला: महार (702)
बहावलपुर राज्य महावर: 3,022

जाट उल्लेखनीय व्यक्ति

बक्सा राम महरिया – स्वतंत्रता सेनानी
गणेश राम महरिया – स्वतंत्रता सेनानी
सुभाष महरिया – राजनीतिज्ञ, राजस्थान
सुभाष महरिया: -राजस्थान प्रशासनिक सेवा, परिहार, चूरू से

राजस्थान और हरियाणा के जाटों में क्या अंतर है?

हरियाणा और राजस्‍थान में जाट प्रमुख जाति के रूप में देखे जाते है लेकिन राजस्‍थान और हरियाणा के जाटों में काफी अंतर देखने को मिलता है। राजस्‍थान के जाट मुख्‍य रूप से किंग मेकर की भूमिका अदा करते है जबकि हरियाणा के जाट सत्‍ता में रहना पसंद करते है। आज हम आपको बता रहें है कि आखिर हरियाणा और राजस्‍थान के जाटों में क्‍या अंतर है।

राजस्थान के जाट व हरियाणा के जाटों में मुख्य अंतर – जाट वेशभूषा भी अलग

1.राजस्थान के जाट हरियाणा के जाटों की अपेक्षा अपने नाम के साथ अधिकतर चौधरी टैग यूज़ करते है , अजमेर , भीलवाड़ा , टोंक के जाट तो सीधा ही अपने नाम के साथ जाट लगाते है , जबकि हरियाणा में जाट अधिकतर गोत्र ही इस्तेमाल करते है ।

2. हरियाणा के जाट अधिक पढ़े लिखे है (साक्षरता दर के आधार पर) लेकिन सर्विसेज में ज्यादा राजस्थान के जाट मिलते है ।

3. हरियाणा के जाट खेलकुदों के प्रति उत्साहित है जबकि राजस्थान के जाट रूढ़िवादी है और इन सब में अपने बच्चों को नहीं भेजना चाहते , हालांकि पिछले कुछ वर्षों में यह सूरतेहाल बदला है ।

4. राजस्थान के जाट हरियाणा के जाटों से अधिक कट्टर है , यह इस तथ्य से स्पष्ठ होता है कि लगातार सबसे अधिक सालों तक जाट सांसद बनाने का रिकॉर्ड नागौर, राजस्थान को प्राप्त है (50 साल 1971 से अब तक लगातार जाट सांसद) , वहीं लगातार सबसे अधिक समय तक जाट विधायक बनाने का रिकॉर्ड भी राजस्थान की भादरा सीट को है जहां 1952 में पहले चुनावों से लेकर आजतक जाट ही विधायक बनते आ रहे है (68 साल)।

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5. राजस्थान और हरियाणा के जाट अपने अपने राज्य की सबसे बड़ी कौमें है , कृषि के क्षेत्र में व सेना में इनका योगदान सबसे ज्यादा है लेकिन अंतर ये है कि हरियाणा के जाट अपनी ताकत जानते है लेकिन राजस्थान के जाट अपने संख्याबल से परिचित नहीं है , जिससे आजतक हम अपना मुख्यमंत्री नहीं बना सके है ।

6. विदेशों में रोजगार की बात करे तो हरियाणा के जाट ऑस्ट्रेलिया , कनाडा , इंग्लैंड , अमेरिका में हाथ आजमाते है जबकि राजस्थान के जाट खाड़ी देशों में जाते है ।

7. राजस्थान के जाट भारत के प्रत्येक कोने में फैलकर अपने संगठन , सभाएं , सम्मेलन आदि आयोजित करते रहते है जबकि हरियाणा के जाटों में ये कम देखने को मिलता है ।

8. अगर जाटों की बड़ी गोत्रों की बात की जाए तो मलिकों को छोड़कर सभी गौत्रें राजस्थान मूल की है या राजस्थान में अधिक पाई जाती है जैसे पुनिया , गोदारा , दहिया , हुड्डा , सिहाग , बेनीवाल आदि।जबकि हरियाणा में जाट राजस्थान के इलाकों से माइग्रेटेड है ।

9. राजस्थान के जाट आज भी अपने बच्चों की कम उम्र में ही शादी करना पसंद करते है , जबकि हरियाणा के जाट अधिक जागरूक है और सही उम्र में ही बच्चों के हाथ पीले करते है ।

10. शायद ये पूरी तरह सही नहीं है लेकिन गैर जाटों के विचार ये है कि राजस्थान के जाट अधिक शांत , समझदार होते है जबकि हरियाणा के जाट कुछ गर्म मिजाज व अक्खड़ किस्म के होते है ।

11. राजस्थान के कई इलाकों में सदियों पहले जाट गोत्रों ने गणतन्त्रों के रूप में शासन किया है(जैसे नागौर के दहिया जाटों ने लगभग 850 सालों तक विमलराज से पीपा देव तक राज किया , इसके अलावा सारण , जोहिया , सिहाग , बेनीवाल , भूकर ,खसवां , साहू, गोदारा , जाखड़ , श्योराण , आदि भी जाट गणतन्त्र रहे ) जबकि हरियाणा में इस प्रकार के इतिहास की कोई जानकारी नहीं है

12. जाटों के पहनावे भी हरियाणा व राजस्थान में अलग अलग है ।


हरियाणा के जाटों की वेशभूषा

हरियाणा जाट
third party image

13 .एक तथ्य ये भी है कि राजस्थान की राजनीति में जाटों का योगदान जिस गति से बढ़ा है , उसी गति से हरियाणा में कम हुआ है ।
लोकसभा – 2019
राजस्थान – 7 जाट सांसद
हरियाणा – 2 जाट सांसद

14 .हरियाणा में जाट लगभग सारे हरियाणा में फैले हुए है , जबकि राजस्थान में जाट आधे राज्य में ही फैले है ।

15. राजस्थान के जाट लगभग 30 से ज्यादा बोलियां, उपबोलियाँ , लहजे बोलते है वहीं हरियाणा में यह संख्या 4 या 5 तक है ।

16. राजस्थान में जाट लोकदेवताओं का महत्व बड़े स्तर पर है जैसे तेजा जाट , बिग्गा जाखड़ ,भगवान जसनाथ आदि जबकि हरियाणा यह चलन नहीं है ।

17. भले ही यह कुछ मित्रों को कड़वा लग सकता है लेकिन सत्य ये है कि हरियाणा जाट म्यूजिक इंडस्ट्री में गाने ज्यादा वल्गर , फूहड़ , कानफोड़ू होते है और लड़की , बन्दूक , गाड़ियों के इर्द गिर्द ही घूमते है वहीं राजस्थानी जाट म्यूजिक इंडस्ट्री में गाने आज भी अधिकतर प्रकृति विषयक , लोकदेवताओं को समर्पित , या सामाजिक रस्मों-रवायतों से जुड़े होते है ।

राजस्थान के जाटों की वेशभूषा (शेखावाटी)

rajasthan female dress

18. दिल्ली से सटे होने के कारण हरियाणा के जाटों की सोच तेजी सेआधुनिक हुई जबकि राजस्थान के जाट देरी से शिक्षित हुए व शिक्षित होने पर भी सोच मध्यकालीन ही रही , जहां एक हरियाणवी जाट परिवार में अधिकतम 3 या 4 सन्तानें मिलती है वहीं राजस्थान में यह 5 से लेकर 12 तक भी हो सकती है ।

19. हरियाणा के जाट सामान्यतः एक ही रंग की पगड़ी पहनते है , जबकि राजस्थान के जाट सामान्य दिनों में सफेद व पारिवारिक शादी समारोहों में रंग बिरंगी पांच रंगों की पगड़ियां(साफे) पहनते है ।

20. लगातार मारवाड़ी बनियों के सम्पर्क में रहने से राजस्थान के जाट कुशल व्यापारी व सफल उद्यमी बन कर उभरे है , कोलकाता , दिल्ली , सूरत , बॉम्बे , मद्रास में राजस्थानी जाटों ने व्यापार खूब फैलाया है जबकि हरियाणा के जाट स्थानीय स्तर पर ही सफल हुए है ।

21. जाट समाज में साहित्य व पत्र पत्रिका लेखन में अधिकतर योगदान राजस्थान के जाटों ने दिया है ..
बड़े स्तर पर प्रकाशित राज्य या राष्ट्रीय स्तर की जाट मैगज़ीन्स की संख्या राज्यवार ये है –
राजस्थान – 11
हरियाणा – 3
उत्तरप्रदेश – 4

22. भक्ति व धर्म के क्षेत्र में हरियाणा के जाट कम सक्रिय रहे है जबकि राजस्थान में जाटों का इस क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान रहा है – करमाबाई , फुल्लांबाई , रानाबाई , धन्ना भगत आदि के भजन आज भी सभी समाजों के लोग गुनगुनाते है ।

23. हरियाणा व पंजाब के जाटों ने अपनी राजनीति राजस्थान में आकर भी चमकाई है व राजस्थान की सीटों से लोकसभा व विधानसभा चुनाव जीते है, लेकिन राजस्थान के जाट ऐसा नहीं कर पाए है , जैसे ●चौधरी देवीलाल – सीकर से लोकसभा सांसद रहे


●चौधरी बलराम जाखड़ – सीकर व बीकानेर से लोकसभा सांसद (दो बार लोकसभा स्पीकर )
●बॉलीवुड के हीमैन धर्मेंद्र देओल – बीकानेर से सांसद रहे
●अजय चौटाला – सीकर (दांतारामगढ़) व नोहर(हनुमानगढ़) से विधायक रहे ।
●स्वामी सुमेधानंद सरस्वती- वर्तमान सीकर सांसद जो तीसरी बार लोकसभा चुनाव जीते है ।


24. हरियाणा में जाट जनरल केटेगरी में आते है और राजस्थान में ओबीसी कैटेगरी में आते है ।
हालांकि जाट जैसी समृद्ध जाति को आरक्षण की कोई आवश्यकता नहीं है , जाट होकर भी मैं व्यक्तिगत रूप से हमें प्रदत आरक्षण को सही नहीं मानता । राजस्थान में 92 जातियां ओबीसी में आती है ,लगभग प्रत्येक प्रतियोगी परीक्षा में जाट अकेले ओबीसी की 35-40 % सीटों पर कब्जा कर लेते है

25. हरियाणा में वे खुद किंग्स है और राजस्थान में वे सबसे बड़े किंग मेकर्स है ।

राजस्थान के जाटों की वेशभूषा (मारवाड़)

राजस्‍थान के जाट
third party image
Jat Mahasabha जानिये दो जाट महासभा में अंतर

Jat Mahasabha अखिल भारतवर्षीय जाट महासभा तथा अखिल भारतीय जाट महासभा स्थापना एवं अन्तर

देश व विदेश में कई जाट सभाएं Jat Mahasabha है जो समाज के लिए कार्य रही है । लेकिन देश में दो जाट महासभाएं Jat Mahasabha ऐसी है जो पुरानी है और एक जैसा नाम है जिसके कारण अक्‍सर लोग इन दोनों में अंतर नहीं कर पाते। आज हम आपको बताने जा रहे है ऐसी दो दो जाट महासभाओं के बारे में जो काफी पुरानी है नाम एक सा है लेकिन इनका इतिहास कुछ अलग सा है । तो चलिए जानते है जाट महासभा के बारे में

देश में सबसे पहली जिस महासभा का गठन किया गया था, उसका नामकरण हुआ था अखिल भारतवर्षीय जाट महासभा Akhil Bharatvarshiya Jat Mahasabha के रूप में। इस महासभा के गठन की औपचारिक घोषणा सन् 1907 में मुजफ्फरनगर उत्तर प्रदेश में सम्पन्न हुए जाट सम्मेलन में की गयी थी।

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अखिल भारतवर्षीय जाट महासभा Akhil Bharatvarshiya Jat Mahasabha, के पहले अध्यक्ष राजा दत्त प्रसाद सिंह मुरसान ( अलीगढ़) उप प्रधान राव बहादुर गिरिराज सिंह, कुचेसर और मंत्री कुंवर हुक्म सिंह, मथुरा थे।

सन् 1918 में अखिल भारतीय जाट महासभाAkhil Bharatiya Jat Mahasabha के महा अध्यक्ष (मुख्य संरक्षक) धौलपुर नरेश महाराणा सासब बहादुर तथा अध्यक्ष रायबहादुर चौ लालचंद जी फौगाट भालौठ बने।

दिनांक 28 व 29 मार्च 1925 को मेरठ के नौचन्दी मेले में आयोजित जाट सम्मेलन में कुंवर कल्याण सिंह रईस बरकातपुर, बुलन्दशहर को अध्यक्ष चुना गया जबकि कुंवर हुकम सिह रईस मथुरा को मंत्री चुना गया। इसके बाद सन् 1927 में गढमुक्तेश्वर में गंगा मेले पर जाट सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसमें कुंवर सरदार सिंह रईस मुरादाबाद को अध्यक्ष तथा कुंवर हुकम सिह रईस मथुरा को मंत्री चुना गया।

सन् 1935 में जालंधर शहर में आयोजित जाट सम्मेलन में चौ शिव ध्यान सिंह, पिशावा को अध्यक्ष तथा ठाकुर झम्मन सिंह जी को का महामंत्री (इस सभा में मंत्री पद का नाम महामंत्री किया गया था) नियुक्त किया गया था।
1938 में लायलपुर में सम्पन्न हुए अखिल भारतवर्षीय जाट महासभा के राष्ट्रीय सम्मेलन में सर शहाबुद्दीन ने चौधरी छोटूराम जी को रहबरे आजम की उपाधि से विभूषित किया।

इस समय तक संस्था के 11सभासद थे, जो निम्न प्रकार हैं-

दानवीर सेठ छाजूराम, दीनबन्धु सर छोटूराम, राय बहादुर लालों एडवोकेट, सदस्य पंजाब पब्लिक कमीशन, कुंवर कल्याण सिंह जी रईस बरकातपुर, बुलन्दशहर, डॉ भोपाल सिंह मेरठ, चौधरी रिसाल सिंह, पहाड़ी धीरज, दिल्ली, ठाकुर शिव ध्यान सिंह रईस पिसावा, अलीगढ़, स्वामी पदमदास, ठाकुर झम्मन सिंह एडवोकेट, दिल्ली, सरदार सुरेन्द्रपाल सिंह एडवोकेट, दिल्ली तथा सरदार रघुवीर सिंह, साँसी नरेश।

1945 में भरतपुर अधिवेशन में सरदार बलदेव सिंह को अध्यक्ष चुना गया।
1947 में भारत विभाजन का सभा के संगठन पर बहुत प्रभाव पड़ा और सभा के कई महत्वपूर्ण मुस्लिम और सिख सदस्य संगठन छोड़ गये। बलदेव सिंह की निष्क्रियता के कारण भरतपुर महाराज बृजेन्द्र सिंह को अध्यक्ष निर्वाचित किया गया।

1948 में मुरसान नरेश महेंद्र प्रताप सिंह जी की अध्यक्षता में सभा का 40वां सम्मेलन सोनीपत में सम्पन्न हूआ था। राजा महेंद्र प्रताप सिंह 32वर्ष की अपार साधना के बाद कुछ ही समय पहले विदेश से लौटे थे। इस अधिवेशन में महाराजा भरतपुर सवाई बृजेन्द्र सिंह जी ने स्वेच्छा से राजा महेंद्र प्रताप सिंह के लिए पद त्याग दिया। और राजा महेंद्र प्रताप सिंह सभा के अध्यक्ष चुने गये।
सन् 1956 के सम्मेलन में भी राजा महेंद्र प्रताप सिंह जी को पुनः अध्यक्ष चुना गया।

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1965 में सैदपुर, बुलन्दशहर में आयोजित जाट सम्मेलन में राजा महेंद्र प्रताप सिंह जी को पुनः अध्यक्ष और ठाकुर झम्मन सिंह एडवोकेट को महामंत्री चुना गया। 1966 में डेम्पियर पार्क मथुरा में आयोजित जाट सम्मेलन में भी राजा महेंद्र प्रताप सिंह जी को पुनः अध्यक्ष चुना गया और महामंत्री के रूप में चौधरी रामरिख बेनीवाल, जयपुर को महामंत्री नियुक्त किया गया।

साल 1969 में आयोजित जाट सम्मेलन में महाराजा भरतपुर सवाई बृजेन्द्र सिंह को अध्यक्ष तथा ठाकुर देशराज झगीना , राजस्थान को महामंत्री चुना गया। 1976 में राजा महेन्द्र प्रताप को पुनः अध्यक्ष बनाया चुना गया। 1979 में राजा महेन्द्र प्रताप के निधन के बाद चौधरी विरेन्द्र सिंह एडवोकेट को कार्यवाहक अध्यक्ष बनाया गया।

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1983 में मथुरा में आयोजित जाट सम्मेलन में कैप्टन भगवान सिंह फौजदार (पूर्व उच्चायुक्त) को अध्यक्ष तथा कमलेश भारतीय को महामंत्री चुना गया।
1991 के आगरा सम्मेलन में भरतपुर महाराज विश्वेंद्र सिंह को अध्यक्ष और चौधरी नेपाल सिंह चौहान, नैनीताल को महामंत्री चुना गया।

13 सितंबर 1998 को दिल्ली अधिवेशन में चौ दारा सिंह को अध्यक्ष और चौधरी युद्धवीर सिंह महिपालपुर को महामंत्री चुना गया। चौधरी दारा सिंह को स्थानापन्न कर 2008 में दिल्ली के पूर्व चीफ कमिश्नर वीरेन्द्र सिंह (आईएएस) को महाराजा विश्वेन्द्र सिंह द्वारा नया अध्यक्ष मनोनीत किया गया। चौ वीरेन्द्र सिंह द्वारा गठित नयी कार्यकारिणी में अब तक के महासचिव युद्ध बीर सिंह के स्थान पर पूर्व केंद्रीय मंत्री सोमपाल शास्त्री जी के छोटे भाई देवपाल सिंह जी को महासचिव चुना गया।

इसके उपरांत युद्ध बीर सिंह आदिे ने अखिल भारतवर्षीय जाट महासभा के नाम से हू-ब-हू मेल खाते हुए नाम अखिल भारतीय जाट महासभा का पंजीकरण कराया। यद्यपि इस प्रकार के मिलते-जुलते नाम से पंजीकरण होना सम्भव नहीं था, लेकिन दिल्ली के ख्यात जाट राजनेता स्व दीपचंद बन्धु के माध्यम से यह संस्था अस्तित्व में आयी। चौ दारा सिंह जी को ही इस नवीन संस्था का अध्यक्ष मनोनीत किया गया। देश के मुश्किल से एक दर्जन जाटों को छोड़कर किसी को कानों कान भी खबर न हो सकी कि दूसरी जाट महासभा कब अस्तित्व में आ गयी।

पता नहीं क्यों नयी जाट महासभा द्वारा आम जन को कभी भी इस सम्बन्ध में कुछ नहीं बताया गया। (आज तक भी आम जाट को इन दोनों संस्थाओं के लगभग एक से नामों के अन्तर और इन दोनों संस्थाओं के इतिहास के विषय में कोई जानकारी नहीं है। अधिकांश लोगों को यही पता है कि अखिल भारतीय जाट महासभा ही वह संस्था है जो पहले से चलती आ रही है।

यहां यह ध्यान देने योग्य है कि अखिल भारतवर्षीय जाट महासभा Akhil Bharatvarshiya Jat Mahasabha नाम केवल लिखने तक ही सीमित था, वरन् तो लोग बोलने की आसानी के कारण इसे अखिल भारतीय जाट महासभा Akhil Bharatiya Jat Mahasabha ही कह कर पुकारते थे। यानी जब उनकी जुबान पर चढ़ा नाम, वही पहले से कार्यरत अध्यक्ष और वही महामंत्री, वही कार्यकारिणी-सब कुछ वही पहले जैसा था, तो लोग स्वाभाविक रूप से नयी संस्था को ही मूल संस्था मान बैठे।)

चौ दारा सिंह जी के निधन के बाद अखिल भारतीय जाट महासभा की बागडोर पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय सिंह जी को सौंपी गयी। मावलंकर हाल में सम्पन्न हुए अखिल भारतीय जाट महासभा के सम्मेलन में जाट समाज के स्तम्भों-पूर्व लोकसभा अध्यक्ष डॉ बलराम जाखड, पूर्व केंद्रीय विदेश मंत्री चौ नटवर सिंह, तत्कालीन मुख्यमंत्री हरियाणा चौ भूपेन्द्र हुड्डा, पूर्व सासंद हरेन्द्र मलिक, पूर्व राज्यपाल चन्द्रवती आदि की उपस्थिति में चौ अजय सिंह जी को महासभा का स्थायी राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित कर दिया गया।

किन्तु महासभा के राष्ट्रीय महासचिव युद्ध बीर सिंह और चौ अजय सिंह जी के बीच कुछ मतभेद होने के कारण 12 मई 2013 को शिमला में प्रदेश जाट सभा अध्यक्षों के माध्यम से पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को अध्यक्ष घोषित कर दिया।

वर्तमान में दो जाट महासभाए कार्यरत हैं-1907 में गठित अखिल भारतवर्षीय जाट महासभा जिसकी अध्यक्षता चौ वीरेन्द्र सिंह पूर्व आईएएस ने की थी। तो 2008 में गठित अखिल भारतीय जाट महासभा की अध्यक्षता कैप्टेन अमरेन्दर सिंह कर रहे हैं।

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jaat के बारे में क्‍या सोचते है लोग

jaat – बादशाह आलमगीर द्वितीय ने महाराजा सूरजमल के बारे में अब्दाली को लिखा था – जाट jaat जाति जो भारत में रहती है, वह और उसका राजा इतना शक्तिशाली हो गया है कि उसकी खुली खुलती है और बंधी बंधती है ।

jaat

jaat कर्नल अल्कोट – हमें यह कहने का अधिकार है कि 4000 ईसा पूर्व भारत से आने वाले जाटों ने ही मिश्र (इजिप्ट) का निर्माण किया ।

  • यूरोपीयन इतिहासकार मि0 टसीटस ने लिखा है – जर्मन लोगों को प्रात: उठकर स्नान करने की आदत जाटों ने डाली । घोड़ों की पूजा भी जाटों ने स्थानीय जर्मन लोगों को सिखलाई । घोड़ों की सवारी जाटों की मनपसंद सवारी है ।
  • तैमूर लंग – घोड़े के बगैर जाट, बगैर शक्ति का हो जाता है । (हमें याद है आज से लगभग 50 वर्ष पहले तक हर गाँव में अनेक घोडे, घोडिय़ाँ जाटों के घरों में होती थीं । अब भी पंजाब व हरयाणा में जाटों के अपने घोड़े पालने के फार्म हैं – लेखक)
  • भारतीय सेना के ले0 जनरल के. पी. कैण्डेय ने सन् 1971 के युद्ध के बाद कहा था – अगर जाट न होते तो फाजिल्का का भारत के मानचित्र में नामोनिशान न रहता ।
    इसी लड़ाई (सन् 1971) के बाद एक पाकिस्तानी मेजर जनरल ने कहा था – चौथी जाट बटालियन का आक्रमण भयंकर था जिसे रोकना उसकी सेना के बस की बात नहीं रही । (पूर्व कप्तान हवासिंह डागर गांव कमोद जिला भिवानी (हरियाणा) जो 4 बटालियन की इस लड़ाई में थे, ने बतलाया कि लड़ाई से पहले बटालियन कमाण्डर ने भरतपुर के जाटों का इतिहास दोहराया था जिसमें जाट मुगलों का सिहांसन और लाल किले के किवाड़ तक उखाड़ ले गये थे । पाकिस्तानी अफसर मेजर जनरल मुकीम खान पाकिस्तानी दसवें डिवीजन के कमांडर थे ।)
  • भूतपूर्व राष्ट्रपति जाकिर हुसैन ने जाट सेण्टर बरेली में भाषण दिया – जाटों का इतिहास भारत का इतिहास है और जाट रेजिमेंट का इतिहास भारतीय सेना का इतिहास है । पश्चिम में फ्रांस से पूर्व में चीन तक ‘जाट बलवान -जय भगवान का रणघोष गूंजता रहा है ।
  • विख्यात पत्रकार खुशवन्तसिंह ने लिखा है – (i) “The Jat was born worker an warrior. He tille, his lan, with his swor, girçe, roun, his waist. He fought more battles for the efence for his homesteaç than other Khashtriyas” अर्थांत् जाट जन्म से ही कर्मंयोगी तथा लड़ाकू रहा है जो हल चलाते समय अपनी कमर से तलवार बांध कर रखता था। किसी भी अन्य क्षत्रिय से उसने मातृभूमि की ज्यादा रक्षा की है ।
    (द्बद्ब) पंचायती संस्था जाटों की देन है और हर जाटों का गांव एक छोटा गणतन्त्र है ।
    जब 25 दिसम्बर 1763 को जाट प्रतापी राजा सूरजमल शाहदरा में धोखे से मारे गये तो मुगलों को विश्वास ही नहीं हुआ और बादशाह शाहआलम द्वितीय ने कहा – जाट मरा तब जानिये जब तेरहवीं हो जाये । (यह बात विद्वान् कुर्क ने भी कही थी ।)
    टी.वी ने एक दिन द्वितीय विश्वयुद्ध के इतिहास को दोहराते हुए दिखलाया था कि जब सन् 1943 में फ्रासं पर जर्मनी का कब्जा था तो जुलाई 1943 में सहयोगी सेनाओं ने फ्रांस में जर्मन सेना पर जबरदस्त हमला बोल दिया तो जर्मन सेना के पैर उखडऩे लगे । एक जर्मन एरिया कमांडर ने अपने सैट से अपने बड़े अधिकारी को यह संदेश भेजा कि ज्यादा से ज्यादा गु_ा सैनिकों की टुकडिय़ाँ भेजो । जब उसे यह मदद नहीं मिली तो वह अपनी गिरफ्तारी के डर में स्वास्तिक निशानवाले झण्डे को सेल्यूट करके स्वयं को गोली मार लेता है । याद रहे जर्मनी में जाटों को गुट्टा के उच्चारण से ही बोला जाता है ।
    एक बार अलाउद्दीन ने देहली के कोतवाल से कहा था – इन जाटों को नहीं छेडऩा चाहिए । ये बहादुर लोग ततैये के छत्ते की तरह हैं, एक बार छिडऩे पर पीछा नहीं छोड़ते हैं । इतिहासकार मो0 इलियट ने लिखा है – जाट वीर जाति सदैव से एकतंत्री शासन सत्ता की विरोधी रही है तथा ये प्रजातंत्री हैं ।
    संत कवि गरीबदास – जाट सोई पांचों झटकै, खासी मन ज्यों निशदिन अटकै । (जो पाँचों इन्द्रियों का दमन करके, बुरे संकल्पों से दूर रहकर भक्ति करे, वास्तव में जाट है ।
    महान् इतिहासकार कालिकारंजन कानूनगो – (क) एक जाट वही करता है जो वह ठीक समझता है । (इसी कारण जाट अधिकारियों को अपने उच्च अधिकारियों से अनबन का सामना करना पड़ता है – लेखक)
    (ख) जाट एक ऐसी जाति है जो इतनी अधिक व्यापक और संख्या की दृष्टि से इतनी अधिक है कि उसे एक राष्ट्र की संज्ञा प्रदान की जा सकती है ।
    (ग) ऐतिहासिक काल से जाट बिरादरी हिन्दू समाज के अत्याचारों से भागकर निकलने वाले लोगों को शरण देती आई, उसने दलितों और अछूतों को ऊपर उठाया है । उनको समाज में सम्मानित स्थान प्रदान कराया है। (लेकिन ब्राह्मणवाद तो यह प्रचार करता रहा कि शूद्र वर्ग का शोषण जाटों ने किया
    (घ) हिन्दुओं की तीनों बड़ी जातियों में जाट कौम वर्तमान में सबसे बेहतर पुराने आर्य हैं।
    महान् इतिहासकार ठाकुर देशराज – जाटों को मुगलों ने परखा, पठानों ने इनकी चासनी ली, अंग्रेजों ने पैंतरे देखे और इन्होंने फ्रांस एवं जर्मनी की भूमि पर बाहदुरी दिखाकर सिद्ध किया कि जाट महान् क्षत्रिय हैं । पं0 इन्द्र विद्यावाचस्पति- जाटों को प्रेम से वश में करना जैसा सरल है, आँख दिखाकर दबाना उतना ही कठिन है ।
    कवि शिवकुमार प्रेमी – जाट जाट को मारता यही है भारी खोट। ये सारे मिल जायें तो अजेय इनका कोट (कोट का अर्थ किला) इसीलिए तो कहा जाता है – जाटड़ा और काटड़ा अपने को मारता है ।
    विद्वान् विलियम क्रू – जाट विभिन्न धार्मिक संगठनों व मतों के अनुयायी होने पर भी जातीय अभिमान से ओतप्रोत हैं । भूमि के सफल जोता, क्रान्तिकारी, मेहनती जमीदार तथा युद्ध योद्धा हैं । (इसीलिए तो जाटों या जट्टों के लड़के अपनी गाडिय़ों के पीछे लिखवाते हैं – ‘जट्ट दी गड्डी, ‘जाट की सवारी ‘जहाँ जाट वहाँ ठाठ, ‘जाट के ठाठ तथा ‘आदि-आदि – लेखक । स्पेन, गाल, जटलैण्ड, स्काटलैण्ड और रोम पर जाटों ने फतेह कर बस्तियां बसाई । विद्वान् ए.एच. बिगले – जाट शब्द की व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं है । यह ऋग्वेद, पुराण और मनुस्मृति आदि अत्यन्त प्राचीन ग्रन्थों से स्वत: सिद्ध है । यह तो वह वृक्ष है जिससे समय-समय पर जातियों की उत्पनि हुई ।
    विद्वान् कनिंघम – प्राय: देखा गया है कि जाट के मुकाबले राजपूत विलासप्रिय, भूस्वामी गुजर और मीणा सुस्त अथवा गरीब, कास्तकार तथा पशुपालन के स्वाभाविक शोकीन, पशु चराने में सिद्धहस्त हैं, जबकि जाट मेहनती जमीदार तथा पशुपालक हैं । विख्यात इतिहासकार यदुनाथ सरकार – जाट समाज में जाटनियां परिश्रम करना अपना राष्ट्रीय धर्म समझती हैं, इसलिए वे सदैव जाटों के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर कार्य करती हैं । वे आलसी जीवन के प्रति मोह नहीं रखती ।
    प्राचीन इतिहासकार मनूची – जाटनियां राजनैतिक रंगमंच पर समान रूप से उत्तरदायित्व निभाती हैं । खेत में व रणक्षेत्र में अपने पति का साथ देती हैं और आपातकाल के समय अपने धर्म की रक्षा में प्रोणोत्र्सग (प्राणत्याग) करना अपना पवित्र धर्म समझती हैं ।
    जैक्मो फ्रांसी इतिहासकार व यात्री लिखता है – महाराजा रणजीतसिंह पहला भारतीय है जो जिज्ञासावृत्ति में सम्पूर्ण राजाओं से बढ़ाचढ़ा है । वह इतना बड़ा जिज्ञासु कहा जाना चाहिए कि मानो अपनी सम्पूर्ण जाति की उदासीनता को वह पूरा करता है । वह असीम साहसी शूरवीर है । उसकी बातचीत से सदा भय सा लगता है। उन्होंने अपनी किसी विजययात्रा में कहीं भी निर्दयता का व्यवहार नहीं किया ।
    यूरोपीय यात्री प्रिन्सेप – एक अकले आदमी द्वारा इतना विशाल राज्य इतने कम अत्याचारों से कभी स्थापित नहीं किया गया । अद्भुत वीरता, धीरता, शूरता में समकालीन सभी भारतीय नरेशों के शिरमौर थे । दूसरे शब्दों में पंजाबकेसरी महाराजा रणजीतसिंह भारत का नैपोलियन था।
    महान् इतिहासकार उपेन्द्रनाथ शर्मा – जाट जाति करोड़ों की संख्या में प्रगितिशील उत्पादक और राष्ट्ररक्षक सैनिक के रूप में विशाल भूखण्ड पर बसी हुई है। इनकी उत्पदाक भूमि स्वयं एक विशाल राष्ट्र का प्रतीक है ।
    विद्वान् सर डारलिंग – ”सारे भारत में जाटों से अच्छी ऐसी कोई जाति नहीं है जिसके सदस्य एक साथ कर्मठ किसान और जीवंत जवान हों
    महान् इतिहासकार सर हर्बट रिसले – जाट और राजपूत ही वैदिक आर्यों के वास्तविक उत्तराधिकारी हैं ।
  • ”जाट एक सच्चा सैनिक है । मुझे खुशी होगी यदि मैं जाटों के बीच रहकर इज्जत से मर जांऊ ताकि मेरी आत्मा को शान्ति मिल सके ।
    अंग्रेज प्रमुख जनरल ओचिनलैक (बाद में फील्ड मार्शंल) – हालात बिगड़ते हैं और खतरा आता है तो जाटों को साथ रखने से बेहतर और कुछ नहीं होगा ताकि मैं दुश्मन से लड़ सकूं । क्रान्तिदर्शी राजा महेन्द्रप्रताप – हमारी जाति बहादुर है । देश के लिए समर्पित कौम है । चाहे खेत हो या सीमा । धरतीपुत्र जाटों पर मुझे नाज़ है ।

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jat जाट गोत्र का इतिहास

jat आपको बता दें कि सूर्यवंशी बाल या बालियान जाट गोत्र की कई शाखाओं में एक नाम सिसौदिया और राणा शाखा गोत्र का भी लिया जाता है। अगर इतिहास पर नजर डाले तो इस बलवंश का शासन सन् 407 से 757 ई0 तक, गुजरात में माही नदी और नर्मदा तक, मालवा का पश्चिमी भाग, भड़ोच, कच्छ, सौराष्ट्र और काठियावाड़ पर रहा है। jat जानकारी के अनुसार इस राज्य की स्थापना करने वाला भटार्क नामक वीर जाटवंशी से ही था। जिसने इतिहास में अपने बल वंश के नाम पर गुजरात में काठियावाड़ में बलभीपुर राज्य की स्थापना की थी। jat

अगर बात करें सन् 757 ई0 की तो सिंध के अरब शासक के सेनापति अबरू बिन जमाल ने बलभीपुर राज्य को समाप्त कर दिया। जानकारी के अनुसार यहीं से निकलकर बलवंश के गुहदत्त या गुहादित्य बाप्पा रावल ने अपने नाना राजा माना मौर, जो कि चित्तौड़ का शासक था, को मारकर चित्तौड़ का राज्य हस्तगत कर लिया। बाप्पा रावल ने गुहिल गुहिलोत नाम धारण करके शासन किया। यह गुहिल बलवंश की शाखा है। इसी वंश की सिसौदिया एवं राणा प्रचलित हुई।
एकलिंग माहात्म्य में – अथ कर्णभूमिभतुर्शाखा द्वितीयं विभाति लोके, एका राऊल नाम्नी राणा नाम्नी परा महती। सिसौदे गांव के मूल पुरुष कर्णसिंह से ही रावल और राणा उपाधियों का प्रचलन माना जाता है। किन्तु सिसौदा वालों की रणरसिकता से ही यह प्रचलित हुआ है । किन्तु सिसौदिया की शाखा का नाम राणा क्यों पड़ा, इसकी गहराई में जाने से ज्ञात हुआ कि सन् 1303 में अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर चढाई करके वहां के शासक राजा रतनसिंह को, उसकी सुन्दर रानी पद्मिनी को प्राप्त करने हेतु, युद्ध में हरा दिया।

एक इतिहासकार के लेख के अनुसार बाप्पा रावल के नाम पर चली आने वाली रावल शाखा का शासन राजा रतनसिंह के मरने पर मेवाड़ पर से समाप्त हो गया। कुछ वर्षों के पश्चात् सिसौदिया हमीर ने युद्ध करके चित्तौड़ पर फिर अधिकार कर लिया। फिर अलाउद्दीन खिलजी के मरने तक चित्तौड़ पर आक्रमण नहीं किया। रण में रुचि लेने के कारण हमीर ने राणा पदवी (उपाधि) धारण की। महाराणा अधिक सम्मान का शब्द है।

यह राणा उपाधि केवल उदयपुर राजघराने के लिए ही नहीं, अपितु पंवार जाटवंश के आबू नरेश रावल और उनके निकट परिवार के दान्ता वाले पंवारों का राणा पद यह प्रकट करता है अनेक शूरवीर वंश राणा उपाधि से सम्बोधित हुए हैं। राणा एक खिताब है, वंश नहीं है।
उदाहरणार्थ जाटों में काकराणा, आदराणा, तातराणा, जटराणा, शिवराणा, चौदहराणा आदि कई वंश अपनी राणा उपाधि पर गर्व करते हैं। इसी भांति ताजमहल आगरा के समीप बमरौली के निवासी जाट केवल राणा नाम से अपना परिचय देते हैं।

उन्हीं में से गोहद के राणा लोकेन्द्रसिंह के पूर्वजों ने ग्वालियर और गोहद पर अधिकार करके प्रजातन्त्री शासन स्थिर कर लिया था। धौलपुर राजाओं का गोत्र भमरौलिया था परन्तु उनकी उपाधि राणा थी जो कि राणा नाम से बोले जाते थे। सूर्यवंशी काकुस्थ काक वंश की शाखा काकराणा, चौदहराणा, ठकुरेले हैं।

काकराणा जाटों की भूतपूर्व किला साहनपुर नामक रियासत जिला बिजनौर में थी। इस रियासत के काकराणा जाटों ने सम्राट् अकबर की सेना में भरती होकर युद्धों में बड़ी वीरता दिखाई और अपनी राणा उपाधि का यथार्थ प्रमाण देकर मुगल सेना को चकित कर दिया। इनका वर्णन आईने अकबरी में है। सहनपुर रियासत में काकराणा जाटों के चौदह महारथी (वीर योद्धा) थे जिनके नाम से इस वंश की शाखा चौदहराणा भी है जो पर्वों के अवसर पर साहनपुर रियासत में मूर्ति बनाकर पूजे जाते हैं ।

जटराणा – इस वंश की जाटू या जटराणा नाम पर ख्याति है। इनके हरियाणा में रोहतक जिला में गढ़ी कुण्डल, कुजोपुर, सैदपुर, सोहती आद जटराणा गोत्र के गांव हैं। जबकि मुजफ्फरनगर में दतियाना, खेड़ा गढी के समीप 12 गांव हैं। जिला रोहतक में गढ़ी कुंडल, कुजोपुर, सैदपुर, सोहटी गांव हैं। जिला बिजनौर में मायापुर, सोफतपुर, सहारनपुर में उदलहेड़ी, नंगला, सलारू, मन्नाखेड़ी जटराणा जाटों के प्रमुख गांव हैं।

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डबास जाट गोत्र का इतिहास history dabaj jaat
Parvin Dabas actresses
Parvin Dabas actresses

डबास (dabas) गोत्र जाटों में एक प्रमुख गोत्र के रूप में गिना जाता है। यह अति प्राचीन क्षत्रिय संघ का गोत्र है। आपको बता दें कि डबास गोत्र दहिया जाट गोत्र की शाखा है। दोनों गोत्रों का काफी पुराना भाईचारा है इसीलिए दहिया ओर डबास (dabas) गोत्रों में आपस में शादी- ब्याह के रिश्ते नहीं होते है। इन दोनों गोत्रों के जाट विदेशों में तथा भारत में साथ-साथ रहे हैं। आज भी ये दोनों गोत्र साथ-साथ आबाद हैं। डबास (dabas) जाट छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व कैस्पियन सागर के दक्षिण-पूर्व में बसे हुए थे। इनके साथ-साथ दहिया जाट भी उसी क्षेत्र में आबाद थे जिनके नाम पर यह सागर दधी सागर कहलाया था। यूनान के एक इतिहासकार ने अपनी भाषा में डबासों का नाम डरबिस लिखा है। सीथिया देश (मध्य एशिया) का एक प्रांत मस्सागेटाई जाटों का एक छोटा तथा शक्तिशाली राज्य था जिसकी रानी तोमरिस थी। 529 ई0 पू0 में इस रानी की जाट सेना का युद्ध महान् शक्तिशाली सम्राट् साईरस से हुआ था। इस युद्ध में सम्राट् साईरस मारा गया और जाट महारानी तोमरिस विजयी रही। इस युद्ध में दहिया/डबास जाट महारानी की ओर से साईरस के विरुद्ध लड़े थे।

जब दहिया जाटों का राजस्थान में राज्य समाप्त हो गया तब ये लोग डबास जाटों के साथ हरियाणा में जिला रोहतक व सोनीपत में आकर आबाद हो गये। डबास जाटों के गांव निम्न प्रकार से आबाद हैं – दिल्ली प्रान्त में सोनीपत तहसील की सीमा के निकट कंझावला डबास खाप का प्रधान गांव है। रसूलपुर, सुलतानपुर, पूंठ खुर्द, घेवरा, रानीखेड़ा, मारगपुर, लाडपुर, मदनपुर, चांदपुर, माजरा डबास, बरवाला आदि गांव डबास जाटों के हैं।
इधर से ही निकास प्राप्त करके डबास जाट जिला बिजनौर में आकर बसे। इस जिले में पीपली, डबासोंवाला, सिकैड़ा, पाड़ली, लाम्बाखेड़ा (कुछ घर), मण्डावली, मुजफरा, झिलमिला और नगीना आदि डबास जाटों के गांव हैं।
,दिल्ली में गाँव रानीखेड़ा,मुबारकपुर मदनपुर, रसूलपुर, सुल्तानपुर डबास ,कंझावला ,लाडपुर ,पूठ खुर्द ,बरवाला ,माजरा डबास ,चांदपुर ,घेवरा,गालिबपुर ,जाट खोर

झज्जर में गाँव

गिरावर ,मोहम्मदपुर माजरा,कुलताणा। हिसार में बुडाना,शेखपुरा। राजस्थान में अलवर जिले में भानोत,सराय कलां,टोडरपुर आदि गांव हैं।
समाज सेवी
डॉ. पूर्णसिंह डबास, चौधरी ईश्वर सिंह डबास, चौधरी हरिरत्न सिंह डबास, चौधरी तारासिंह मोहन सिंह, रामसहाय सिंह आदि गणमान्य व्यक्ति हुए हैं।

राजस्थान और हरियाणा के जाटों में अंतर