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boxer सुमित सांगवान दिखेगा मैदान में
boxer सुमित सांगवान
sumit sangwan

boxer नई दिल्ली। दिसंबर 2019 में प्रतिबंधित पदार्थ सेवन मामले में सुनवाई के दौरान राष्ट्रीय डोपिंग रोधी एजेंसी (नाडा) ने सुमित सांगवान पर से प्रतिबंध हटा लिया है। अपनी जांच में नाडा ने यह पाया कि सुमित सांगवान ने प्रतिबंधित पदार्थ का सेवन अंजाने में किया था जिसके कारण उन पर प्रतिबंध लगाना उचित नहीं है जिसे देखते हुए समित सांगवान पर से प्रतिबंध हटा लिया गया हैं। boxer boxer

boxer सुमित सांगवान के बारे में क्या कहा अधिकारी ने

मुक् केबाजी संघ के एक अधिकारी ने बताया कि सुमित सांगवान पर दोष नहीं पाया गया है। जिसके कारण उन पर लगे सभी प्रतिबंधों को हटा लिया गया है अब वह पहले की तरह सभी स्पर्धाओं में सुनियोचित तरीके से भाग ले सकते हैं। नाडा पैनल को सुमित सांगवान यह समझाने में कामयाब रहें कि जिस प्रतिबंधित पदार्थ का सेवन उन्होंने किया था वह अनजाने में की गई गलती के कारण हुआ जिसके कारण नाडा ने उन पर लगे प्रतिबंधों को हटा लिया है। नाडा ने भी अपनी जांच में पाया की सुमित सांगवान सही कह रहें है।

क्या कहा सुमित सांगवान ने

इस संबंध में सुमित सांगवान ने खुशी जाहिर करते हुए कहा कि उन्हें विश्वास था कि उनके साथ न्याय किया जाएगा। नाडा ने जो फैसला दिया वह उससे उत्साहित है। मैं इस फैसले से राहत महसूस कर रहा हूं। मेरे कंधों पर से एक बड़ा बोझ हट गया है। अब मैं अपना पूरा ध्यान खेल की तरफ लगा सकता हूं। जिससे भविष्य में अच्छा कर सकूं। हालांकि सुमित सांगवान निलंबन के कारण 2020 टोक् यो ओलंपिक के क्वालीफायर ट्रायल में हिस्सा नहीं ले सकें जिसके कारण उन्हें काफी परेशानी का सामना करना पड़ा लेकिन खुशी इस बात की है कि भविष्य अन्य स्पर्धाओं में भाग ले सकेंगे और भारत के लिए गौरवशाली पल के लिए कार्य कर सकेंगे। इसके लिए सुमित काफी मेहनत कर रहें है।

डबास जाट गोत्र का इतिहास history dabaj jaat
Parvin Dabas actresses
Parvin Dabas actresses

डबास (dabas) गोत्र जाटों में एक प्रमुख गोत्र के रूप में गिना जाता है। यह अति प्राचीन क्षत्रिय संघ का गोत्र है। आपको बता दें कि डबास गोत्र दहिया जाट गोत्र की शाखा है। दोनों गोत्रों का काफी पुराना भाईचारा है इसीलिए दहिया ओर डबास (dabas) गोत्रों में आपस में शादी- ब्याह के रिश्ते नहीं होते है। इन दोनों गोत्रों के जाट विदेशों में तथा भारत में साथ-साथ रहे हैं। आज भी ये दोनों गोत्र साथ-साथ आबाद हैं। डबास (dabas) जाट छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व कैस्पियन सागर के दक्षिण-पूर्व में बसे हुए थे। इनके साथ-साथ दहिया जाट भी उसी क्षेत्र में आबाद थे जिनके नाम पर यह सागर दधी सागर कहलाया था। यूनान के एक इतिहासकार ने अपनी भाषा में डबासों का नाम डरबिस लिखा है। सीथिया देश (मध्य एशिया) का एक प्रांत मस्सागेटाई जाटों का एक छोटा तथा शक्तिशाली राज्य था जिसकी रानी तोमरिस थी। 529 ई0 पू0 में इस रानी की जाट सेना का युद्ध महान् शक्तिशाली सम्राट् साईरस से हुआ था। इस युद्ध में सम्राट् साईरस मारा गया और जाट महारानी तोमरिस विजयी रही। इस युद्ध में दहिया/डबास जाट महारानी की ओर से साईरस के विरुद्ध लड़े थे।

जब दहिया जाटों का राजस्थान में राज्य समाप्त हो गया तब ये लोग डबास जाटों के साथ हरियाणा में जिला रोहतक व सोनीपत में आकर आबाद हो गये। डबास जाटों के गांव निम्न प्रकार से आबाद हैं – दिल्ली प्रान्त में सोनीपत तहसील की सीमा के निकट कंझावला डबास खाप का प्रधान गांव है। रसूलपुर, सुलतानपुर, पूंठ खुर्द, घेवरा, रानीखेड़ा, मारगपुर, लाडपुर, मदनपुर, चांदपुर, माजरा डबास, बरवाला आदि गांव डबास जाटों के हैं।
इधर से ही निकास प्राप्त करके डबास जाट जिला बिजनौर में आकर बसे। इस जिले में पीपली, डबासोंवाला, सिकैड़ा, पाड़ली, लाम्बाखेड़ा (कुछ घर), मण्डावली, मुजफरा, झिलमिला और नगीना आदि डबास जाटों के गांव हैं।
,दिल्ली में गाँव रानीखेड़ा,मुबारकपुर मदनपुर, रसूलपुर, सुल्तानपुर डबास ,कंझावला ,लाडपुर ,पूठ खुर्द ,बरवाला ,माजरा डबास ,चांदपुर ,घेवरा,गालिबपुर ,जाट खोर

झज्जर में गाँव

गिरावर ,मोहम्मदपुर माजरा,कुलताणा। हिसार में बुडाना,शेखपुरा। राजस्थान में अलवर जिले में भानोत,सराय कलां,टोडरपुर आदि गांव हैं।
समाज सेवी
डॉ. पूर्णसिंह डबास, चौधरी ईश्वर सिंह डबास, चौधरी हरिरत्न सिंह डबास, चौधरी तारासिंह मोहन सिंह, रामसहाय सिंह आदि गणमान्य व्यक्ति हुए हैं।

चार पीढी के बाद पांचवी पीढी ने भी रखा प्रशासनिक सेवा में कदम
ias jagdeep singh son posted as hcs
विश्वजीसिंह श्योराण अपनी बहन गौरी के साथ

प्रशासनिक के बाद राजनीतिक सेवा का रहा है इतिहास

नई दिल्ली। आज के इस दौर में जहां सरकारी जॉब पाने के लिए नौजवान अपनी पूरा सामर्थ्‍य लगा देते है फिर भी अंदेशा बना रहता है कि उन्हें सरकारी जॉब मिले या ना मिले लेकिन वहीं आपको एक ऐसा परिवार मिले जिसकी चार पीढियां सरकारी जॉब में बनी हुई हैं। चारों पीढियां ए ग्रेड की नौकरी पाने में सफल रही है। यह परिवार है हरियाणा के पूर्व शिक्ष मंत्री बहादुर सिंह का। बहादुर सिंह के पोते विश्वजीसिंह श्योराण ने भी अपने पूर्वजों की न क् शे कदम पर चलते हुए एचसीएस बने है। विश्वजीत सिंह के परदादा सरकारी जॉब में थे उसके बाद अपनी मेहनत के बल पर ही दाद, पिता और चाचा के बाद अब विश्वजीत सिंह ने अपने परिवार की परंपरा को बरकरार रखते हुए एचसीएस में अपना नाम दर्ज कराया है।

परिवार में पहले से है कई उच्‍च प्रशासनिक अधिकारी


इस परिवार में विश्वीत के परदादा रामनारायण श्योराण आईएएस बने। जिसके बाद विश्वजीत के दादा बहादुर सिंह ने भी एचसीएस में अपनी सेवा देने के बाद राजनीति का रास्ता अपनाया और प्रदेश में शिक्षा मंत्री के पद पर कार्य करते हुए शिक्षा जगत के विकास के लिए कार्य किया। उसके बाद विश्वजीत के पिता जगदप ने वर्ष १९९३ में एचसीएस की परीक्षा पास कर अपे पिता व दादा की विरासत को बरकरार रखा। वे आज एक आईएएस है। अपने भाई से प्रेरणा लेकर विश्वजीत के चाचा ने भी संदीप सिंह ने भी एचसीएस पास की। ओर अपने पिता के नक् शे कदम पर चलते हुए महेन्द्रगढ सीट से विधानसभा का चुनाव लडा लेकिन हार का सामना करना पड़ा ।
आपको बता दें कि विश्वजीत पिछले तीन साल से आईएएस की तैयारी कर रहा था। इसी बीच उसने एचसीएस की परीक्षा भी दी जिसमें उसकाचयन हो गया। विश्वजीत एलएलबी तक पढाई की है। अगर हम बात करें विश्श्वजीत की बहन की तो वह भी अपने भाई से किसी भी तरह कम नहीं है। उसने भी अपने परिवार के नक् शे कदम पर चलते हुए कार्य किए है। लेकिन यह कार्य उसने राष्ट्रीय स्तर पर ना कर के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किए है अब आप सोच रहे होगे ऐसा क्या किया तो हम आपको बताते है कि विश्वजीत की बहन गौरी श्योराण एक अंतरराष्ट्रीय स्तर की शूटर है जिसने कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में गोल्ड व अन्य मेडल जीते हैं।

Vishwajeet Singh Sheoran Became Hcs Officer

शिक्षा का दान देता पुलिस कांस्टेबल धर्मवीर जाखड़ (Rajasthan Cop Dharamveer Jakhar)
आपणी पाठशाला के बच्‍चों के साथ धर्मवीर जाखड

राजस्थान। आपने ऐसे जाट भाई तो बहुत देखे होंगे जो अन्न दान करते है। आखिर जाट समाज जुड़ा ही भूमि से है लेकिन एक ऐसा जाट है जो शिक्षा दान करता हैं। जिसके कारण ना जाने कितने बच्चों के उज्जवल भविष्य का निर्माण हो चुका हैं। शिक्षा की इसी अलख ने उसे सरकारी पद पर पहुंचाया। लेकिन मन फिर भी नहीं भरा कहीं दिल में एक कसक थी वह पूरी हुई आपणी पाठशाला के निर्माण के साथ। कहानी दिलचस्प हैं। राजस्थान के एक छोटे से जिले चूरू में धर्मवीर जाखड़ पोस्टेड हैं। बात साल 2016 की हैं। काफी सर्दी थी धर्मवीर जाखड़ अपने क्वार्टर में पढ़ाई कर रहें थे कि अचानक बाहर से आवाज आई, बाहर आकर देखा तो कुछ बच्चें भीख मांग रहें है। उम्र छोटी थी ओर भीख में पैसा नहीं खाने की मांग थी तो धर्मवीर जाखड़ ने बच्चों से बात की पता चला कि पुलिस लाईन के पास बसी झुग्गी में बच्चे रहते हैं। बच्चों ने बताया कि उनके माता पिता नहीं है। इस लिए वे भीख मांगने पर मजबूर हैं। उम्र छोटी है तो कुछ ओर कर भी नहीं सकते। धर्मवीर जाखड़ के मन में यह बात घर कर गई तो उन्होंने पास ही झुग्गियों में जाकर सच्चाई जाननी चाहिए। वहां जाकर पता चला कि बच्चे सच बोल रहें थे। कुछ बच्चों के माता पिता का देहांत हो चुका है तो कुछ के माता पिता इतने गरीब है कि उन्हें खाना मांग कर खाना पड़ता हैं। बस वहीं समय था की धर्मवीर जाखड़ ने शिक्षा की लो को अपने में से निकाल कर बच्चों के सामने रख दिया ओर निर्माण हुआ आपणी पाठशाला का।


एक साल पर नए भविष्य का निर्माण आपणी पाठशाला


एक जनवरी 2016 को अपने कुछ दोस्तों के साथ धर्मवीर जाखड ने बच्चों को पढ़ाने का कार्य अपने हाथ में लिया। शुरू -शुरू में केवल 5-6 बच्चे आए जिनको एक घंटे धर्मवीर जाखड़ व उसके दोस्त पढ़ाते थे लेकिन जल्द ही उनकी लगन ओर उज्जवल भविष्य की आस में ओर बच्चे भी आने लगे जिसके कारण बच्चों की संख्या जल्द ही बढ़ कर 30 हो गई।


समय के साथ जुड़ते गए लोग


धर्मवीर जाखड़ व उसके दोस्तों की लगन देखकर ओर लोग भ साथ आने लगे। कुछ ओर परिवारों से बात की तो उन्होंने भी बच्चों के लिए पुराने कपड़े, खिलौने, खाना आदि जुटाना शुरू कर दिया जिससे आपणी पाठशाला को मजबूती मिली व बच्चों पढ़ाई की तरफ ओर भी आकर्षित हुए। बच्चों की लगन व तादात देखकर पढ़ाई का समय दो घंटे कर दिया गया।


समाज भी जुड़ा मुहिम से


समय के साथ सथ आपणी पाठशाला में बच्चों की संख्या बढऩे लगी व लोग भी इस संबंध में जानने लगे तो समाज भी साथ होने लगा। लोग जन्मदिन, पार्टी या किसी त्यौहार पर बच्चों के साथ मनाने के लिए पहुंचने लगे। बच्चों को समाज का साथ मिलने लगा तो उनका भी आत्मविश्वास जागने लगा। लोग उन्हें कपड़े, कॉपी किताब, पेंसिल आदि पढ़ाई की वस्तुएं देने लगे तो कुछ खाने पीने की वस्तुए देने लगे जिससे धर्मवीर जाखड़ की मुहिम तेजी से बढऩे लगे। धीरे धीरे बच्चों की संख्या में भी इजाफा होने लगा तो जगह की कमी होने लगी जिसे देखते हुए पहले थाने में फिर मेडिकल कॉलेज चूरू की दीवार की छांव में उसके बाद औषधि भंडार के खाली हाल में बच्चों को शिक्षा देने के लिए जगह मिली।


रोजाना लगती है कक्षा


आपणी पाठशाला में अब ओर लोग भी जुड़ चुके है । धर्मवीर जाखड़ के कुछ अन्य दोस्त व कुछ महिला कॉस्टेबल नियमित रूप से बच्चों को पढ़ाती हैं। बच्चों की प्रतिभा के कारण कुछ बच्चों का एडमिशन स्कूल में भी हो गया हैं जहां स्कूल ने उनकी फीस माफ कर दी है तो व अन्य पढ़ाई का खर्चा भी स्कूल उठा रहा हैं।