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DSP बनी पूजा जाट
पाँचवें प्रयास में 7वीं रैंक लाकर बनीं DSP पूजा जाट

मंजिल उन्हीं को मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है। पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है। यह पंक्तियाँ पूजा जाट पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं। आपको बता दें कि पूजा जाट ने मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) की परीक्षा पास कर ली है। पूजा जाट ने 7वाँ स्थान हासिल किया है और अब वे डीएसपी बनेंगी। इस सफलता के बाद ग्रामीणों और समाज के लोगों ने पूजा जाट व उनके परिवार को हार्दिक बधाई दी है।

साधारण परिवार से ताल्लुक रखती हैं पूजा जाट

पूजा जाट एक साधारण परिवार से आती हैं। उनके पिताजी एक साधारण किसान हैं, जबकि उनकी माताजी गृहिणी हैं। पूजा का एक बड़ा भाई है, जिसने उनकी पढ़ाई में हर संभव सहयोग दिया।

कर्ज लेकर की पढ़ाई

पूजा के भाई का रुझान हमेशा पढ़ाई की ओर था, लेकिन आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण वे आगे की पढ़ाई नहीं कर सके और काम में लग गए। फिर भी उन्होंने अपनी बहन को पढ़ाने में किसी प्रकार की कमी नहीं आने दी। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद उन्होंने कई बार कर्ज लेकर पूजा की जरूरतें पूरी कीं। भाई के इसी त्याग और सहयोग की बदौलत पूजा जाट आज यह मुकाम हासिल कर सकीं।

पाँचवें प्रयास में 7वीं रैंक लाकर बनीं DSP

पूजा जाट ने इंदौर में रहकर आठ वर्षों तक पढ़ाई की। लेकिन उनका सफर आसान नहीं था। सफलता कई बार उनके हाथ से फिसली। वे कई बार प्रीलिम्स और मेंस तक पहुँचीं, लेकिन अंतिम चयन नहीं हो सका। फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी और हर वर्ष मेहनत बढ़ाती गईं। अंततः अपने पाँचवें प्रयास में उन्होंने मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा में 7वीं रैंक हासिल की और अब वे डीएसपी पूजा जाट कहलाएंगी।

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लड़कियों के लिए बनीं मिसाल

पूजा जाट ने कहा कि उनके भाई की दिन-रात की मेहनत ने उन्हें हर परिस्थिति में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। परिवार ने हमेशा उनका साथ दिया और समाज की नकारात्मक बातों को नज़रअंदाज़ किया। आज वही लोग कहते हैं — “बेटी हो तो पूजा जैसी।

गाँव से ही की पढ़ाई की शुरुआत

जानकारी के अनुसार, पूजा ने अपनी पढ़ाई की शुरुआत गाँव हरवार के प्राथमिक विद्यालय से की थी। आगे की शिक्षा जीरन स्कूल से प्राप्त करने के बाद उन्होंने नीमच कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। सरकारी स्कूलों में पढ़ाई करने के बावजूद पूजा ने अपने दृढ़ संकल्प, अनुशासन और निरंतर परिश्रम से यह मुकाम हासिल किया।

जाट महासभा मेरठ कार्यकारिणी का गठन आम सहमति से
जाट महासभा मेरठ
जाट महासभा मेरठ

मेरठ- जिला जाट महासभा मेरठ की कार्यकारिणी का गठन जाट समाज के शीर्ष नेतृत्व द्वारा समाज के प्रतिष्ठित व्यक्तियो की आम सहमति से सम्पन्न हुआ।
जाट समाज के शीर्ष नेतृत्व चौधरी अमन सिंह एड बाबू बृहमपाल सिंह चुनाव अधिकारी डॉ नरेंद्र तोमर मुख्य संरक्षक बृजपाल सिंह पैसल द्वारा कर्नल एस पी सिंह को अध्यक्ष श्री सुधीर तोमर को उपाध्यक्ष श्री पवन तोमर को महासचिव एड जयराज सिंह को सचिव व ओमवीर राठी को कोषाध्यक्ष मनोनीत किया गया।

जाट महासभा मेरठ की बैठक में क्या कहा चौधरी अमन सिंह ने

चौधरी अमन सिंह ने जाट समाज की एकता व समरसता को बनाये रखने पर जोर दिया और जिला जाट महासभा मेरठ को सशक्त व दायरा बढाने के लिये प्रेरित किया।

नवनियुक्त जिला जाट महासभा अध्यक्ष कर्नल एस पी सिंह ने अपने सम्बोधन मे जाट समाज की एकता व आर्थिक संपन्नता को प्राथमिकता देने की बात कही। शिक्षा खेल व व्यवसाय क्षेत्र मे योजनागत तरीके से समाज को आगे ले जाने पर जाट महासभा कार्य करेगी। जयराज सिंह ने कहा की जाट महासभा जिला मेरठ के साथ जिस तरह सभी क्षेत्रीय सभाओं व समाज के लोगों का साथ रहा है भविष्य में कार्यकारिणी भी इस उम्मीद के साथ समाज में उत्कृष्ट कार्य करने के लिए प्रतिबद्ध रहेगी

जाट महासभा के प्रवक्ता ने कहा कि इस बार की कार्यकारिणी गठन मे जाट समाज के प्रबुद्धजनो ने बढ चढ़ कर हिस्सा लिया व आम सहमति से गठन को लेकर भारी उत्साह देखने को मिला।

एकजुटता का दिया संदेश

श्री रविन्द्र मलिक श्री कल्याण सिंह श्री सतवीर सिवाच श्री धर्मवीर सिंह मलिक श्री बृहमपाल सिंह श्री हरबीर सुमन ने जाट समाज हित मे एकजुट होकर कार्य करने के लिये अपने विचार प्रस्तुत किये व अपना योगदान देने के लिये अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।

चौधरी अमन सिंह जी ने पारिवारिक मिलन जाट समाज मेरठ के अध्यक्ष प्रोफेसर नरेंद्र तोमर के उत्कृष्ट योगदान की सराहना की। यह संस्था समाज हित मे सतत प्रयास करती रहती है ।

बैठक मे डॉ इंद्रपाल मलिक जितेन्द्र धामा अरुण पुनिया सतेंद्र तोमर गजेंद्र पायल सोहनवीर बालियान जगवीर अत्रि वीरेंद्र सरोहा देवेन्द्र ढाका सुमित चौधरी कर्नल विनोद उज्ज्वल सतेंद्र कालखंडे सुखबीर मलिक इत्यादि सैंकड़ो समाजसेवी उपस्थित रहे।

94 वर्ष की आयु में भगवानी देवी डागर ने जीते मेडल

नई दिल्ली। जिस उम्र में लोग भगवान का नाम लेकर केवल खुदा के पास जाने की मन्नत मांगते है अगर उस उम्र में कोई महिला दो देशों में विजय हासिल करें तो आप इसे क्या कहेंगे लेकिन यह बात सच है, जी हां भगवानी देवी डागर ने 90 साल की उम्र में 100 मीटर दौड में स्वर्ण पदक व गोला फेंक में कांस्य पदक जीत कर इतिहास रच दिया है।

भगवानी देवी डागर
भगवानी देवी डागर

नजफगढ़ देहात के मलिकपुर गांव निवासी भगवानी देवी डागर ने 90 से 94 वर्ष के आयु वर्ग में फ़िनलैंड में चल रही वर्ल्ड मास्टर्स एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 100 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक व गोला फेंक में कांस्य पदक जीत कर इतिहास रच दिया।

राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया भगवानी देवी डागर ने

100 मीटर दौड़ में उन्होंने मात्र 24.74 सेकंड का समय निकाला जो कि राष्ट्रीय रिकॉर्ड है।

विश्व रिकॉर्ड 23.15 सेकंड है जिसे तोड़ने से मात्र 1 सेकंड से चूक गयी। इस मुकाम तक इन्हें ले जाने वाले इनके पोते विकास डागर जो कि खुद एक अंतरराष्ट्रीय पैरा एथलीट है और राजीव गांधी स्पोर्ट्स अवार्डी है, उन्होंने बताया कि यहां तक का सफर संघर्ष से भरा रहा है लेकिन आज उनका विश्व चैंपियनशिप में पदक जीतने का मेरा सपना दादी जी ने साकार किया।

दिल्ली स्टेट में 3 गोल्ड मैडल, चेन्नई नेशनल में 3 गोल्ड मैडल जीतने के बाद अब विश्व चैंपियनशिप में 1 गोल्ड और 1 कांस्य पदक जीतना वाकई में ऐतिहासिक है। 5 जुलाई को भगवानी देवी डागर का तीसरा इवेंट डिसकस थ्रो होना अभी बाकी है।

पोते को देखकर खेलना शुरू किया भगवानी देवी डागर

भगवानी देवी डागर के पति लगभग 63 वर्ष पूर्व इस दुनिया से चल बसे थे तब से अब तक पुत्र हवा सिंह डागर की परवरिश खुद करते करते पूरी जिंदगी संघर्षो में गुजारी। पोते विकास डागर ने जब 40 से ज्यादा राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पदक जीते तो इनको भी हौसला आया और खेलो में भाग लेकर देश का नाम रोशन करने का जज्बा आया।

उसके बाद इन्होंने पीछे मुड़कर नही देखा। बचपन मे जिम्मेवारियों का बोझ पड़ जाने के कारण ये प्रतिभा कही न कही दब गई थी जो अब इनके पूरे परिवार के सहयोग से पूरी हो रही है।

भगवानी देवी ने बताया कि बचपन मे वो कबड्डी खेलती थी लेकिन जिम्मेवारियों के चलते कभी खेलो में भाग नही ले सकी। अब उनका भरा पूरा परिवार है और अब उनका जीवन यापन बहुत अच्छे से हो रहा है और खुशी खुशी अपनी जिंदगी जी रहे है।

उनका सपना हमेशा ही देश के लिए कुछ करने का रहा है जो आज पूरा हो गया। उन्हें फक्र है कि उन्होंने देश का झंडा दुनिया मे ऊंचा करके जाट समाज नारी शक्ति औऱ दिल्ली देहात को गौरवान्वित किया।

जाट आरक्षण नहीं तो वोट नहीं: यशपाल मलिक


मेरठ, सुरेन्द्र सिंह। तीन कृषि कानून पर प्रधानमंत्री मोदी के यूटर्न पर देश में अन्य आंदोलनकारियों में एक नई आशा जगी है। जिसका ताजा उदाहरण जाट आरक्षण की सुलगती आग में दिखाई दिया है। जाट आरक्षण की आग एक बार फिर दोबारा सुलगने लगी है। लेकिन इस बार इसकी आंच सड़क पर नहीं दिखाई देगी बल्कि इस बार वोट पर चोट होगी।

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क्या कहा जाट आरक्षण पर यशपाल मलिक ने

इस बार जाट आरक्षण संघर्ष समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष यशपाल मलिक ने जाट आरक्षण आंदोनल के संबंध में घोषणा करते हुए कहा है कि सरकार जाटों को किसी भी प्रकार से कमजोर ना समझे और इस बात का ध्यान रखें कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 125 विधानसभा सीट के साथ ही उत्तराखंड की 15 तथा पंजाब की 100 से अधिक सीट पर जाटों का प्रभाव है।

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अगले साल जाट प्रभाव वाले तीन राज्यों में है चुनाव

उन्होंने कहा कि अगले साल जाटों के प्रभाव वाले इन तीनों राज्यों में विधानसभा चुनाव है तथा इन चुनावों में जाटों का वोट उसी दल को जाएगा जो उन्हें आरक्षण देगा। मलिक ने कहा कि सरकार ने 2015 और 2017 में आरक्षण का वादा किया था जो पूरा किया जाना चाहिए।

केन्द्र सरकार ने जाट समाज से किया था वादा

उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने जाट समाज के प्रमुख संगठनों, मंत्रियों, सांसदों और विधायकों की उपस्थिति में केंद्रीय स्तर पर जाट आरक्षण का वादा किया था और 2017 में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले पूर्व केंद्रीय मंत्री चौधरी बीरेंद्र सिंह के आवास पर आरक्षण का भरोसा दिया गया था। मलिक ने कहा कि वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले भी जाट समाज से वादे किए गए।

सड़कों पर नहीं वोट के साथ होगी आरक्षण की लड़ाई

मलिक ने कहा कि इस बार जाट समुदाय आरक्षण की लड़ाई सड़कों पर नहीं, अपने वोट के निर्णय से करेगा। उन्होंने कहा कि इस संबंध में 25 नवंबर को मुरादाबाद मंडल की बैठक होगी और फिर अलीगढ़, आगरा तथा अन्य मंडलों की बैठक होगी और एक दिसंबर को राजा महेंद्र प्रताप की जयंती के दिन से जनजागरण अभियान चलाया जाएगा।
उन्होंने कहा, जाट ख़ुद को ठगा सा महसूस कर रहा है, उसके वोट से भाजपा ने केंद्र और फिर उत्तर प्रदेश में कुर्सी तो हासिल कर ली लेकिन उसे उसका हक़ नहीं दिया गया।

किसान आंदोलन में जाटों की एंट्री सरकार के लिए परेशानी

नई दिल्ली। सरकार के सामने एक बार फिर जाट खड़े हो चुके है जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि किसान आंदोलन को लेकर सरकार की मुसीबत ओर बढ़ सकती है। हरियाणा और यूपी में जाटों की अच्छी खासी संख्या है जिसके कारण इनका राजनीतिक महत्व भी काफी बढ़ जाता है। हरियाणा और उत्तर प्रदेश के जाट खुल कर किसान आंदोलन का समर्थन कर रहे है और भारी संख्या में आंदोलन में पहुंच रहे है।

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किसान आंदोलन को लेकर जाट महापंचायत में आखिर हुआ क्या

शुक्रवार को जाट महापंचायत का आयोजन किया गया था जिसमें किसानों का समर्थन करने का फैसला लिया गया है। जानकारी के अनुसार जाट महापंचायत में 10 हजार से ज्यादा किसान एकत्रित हुए थे। किसान आंदोलन का समर्थन भाजपा के लिए परेशानी का सबक बन सकता है। महापंचायत में एकत्रित जाटों की संख्या देख कर सभी चौंक गए है। राकेश टिकैत के आंसुओं ने जाटों को एकत्रित कर किसान आंदोलन में शामिल होने के लिए प्रेरित किया है। भारी संख्या में हरियाणा और उत्तर प्रदेश के जाट किसान आंदोलन में शामिल होने के लिए निकल गए है। जिससे सरकार की चिंता बढ़ गई है क्योंकि जाटों का आंदोलन में इस प्रकार से शामिल होना भाजपा को राजनीतिक नुकसान पहुंचा सकता है। पार्टी इस समुदाय को अपने मुख्य वोट बैंक के रूप में देखती है लेकिन जाटों के इस कदम ने भाजपा को चिंता में डाल दिया है।

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आखिर जाट राजनीति क्यों है महत्वपूर्ण

अगर हम बात करें पश्चिम उत्तर प्रदेश की तो यहां के लोगों को देखने से पता चलता है कि यहां या तो किसान है या फिर जवान । आपको बता दें कि जाट राजनीतिक के बड़े किसान नेताओं में महेन्द्र सिंह टिकैत और किसानों के मसीहा कहे जाने वाले चौधरी चरण सिंह इसी धरती से निकले है। एक समय था कि चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत की एक आवाज पर लखनऊ से दिल्ली तक सियासत के गलियारों में हलचल मच जाया करती थी।

वहीं अगर बात करें चौधरी चरण सिंह की तो उन्होंने अपनी जाट राजनीति से इतिहास के पन्नों में अपना एक अलग ही नाम दर्ज किया जिसके कारण उन्हें आज भी किसानों का मसीहा कहा जाता है।

जाट वोटों की गणित

दरअसल, यूपी में 6 से 7% आबादी जाटों की है लेकिन पश्चिमी यूपी में जाट आबादी 17% से अधिक है। तकरीबन 17 लोकसभा सीटों पर यह अपना असर रखते हैं। जबकि 120 विधानसभा सीट प्रभावित करते हैं। जानकार मानते हैं कि पश्चिमी यूपी में कभी जातीय दरार नहीं आई थी लेकिन 1992, 2002 और फिर 2013 में हुए दंगों ने यहां दरार पैदा कर दी। जिसका असर रहा कि 2014 लोकसभा चुनावों में विपक्ष का पश्चिमी यूपी से सूपड़ा ही साफ हो गया।

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इसके बाद 2017 विधानसभा चुनावों और 2019 लोकसभा चुनावों में भी हालात बहुत अच्छे नहीं रहे। ऐसे में समाजवादी पार्टी जहां एक बार फिर पिछड़े और मुस्लिम वोट बैंक के साथ जाटों को जोड़ना चाह रही है तो वहीं बसपा भी दलित और मुस्लिम वोट बैंक के साथ जाटों को जोड़ना चाह रही है। कमोबेश आरएलडी और कांग्रेस भी इसी बहाने अपनी जमीन ढूंढना चाहते हैं।

जाटों की किसान आंदोलन में कुदने की के महत्व की बात करें तो इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि पिछल्ले काफी महीनों से यह आंदोलन चल रहा था लेकिन पीएम ने कभी कोई प्रतिक्रिया किसान आंदोलन पर नहीं दी लेकिन जैसे ही जाटों ने इस आंदोलन को अपना समर्थन दिया तो स्थिति हाथ से निकलते देख कर उन्हें भी कहना पड़ा कि किसान उनसे बस एक फोन कॉल की दूरी पर हैं।

‘बीजेपी के लिए चिंता की कई वजहें’

“हरियाणा में बीजेपी और दुष्यंत चौटाला के विधायक सामाजिक बायकॉट झेल रहे हैं। पंजाब में मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और बादल परिवार नए कृषि कानूनों का विरोध कर रहा है। उनका भरोसा जाट सिखों और किसानों पर है। आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल भी कूद पड़े हैं। पश्चिमी यूपी में हर जाट नेता, चाह वह राकेश टिकैत हों याचुका अजीत सिंह या हरेंद्र मलिक (कांग्रेस), सब आंदोलन का फायदा उठाना चाहते हैं। राजस्थान में एनडीए पहले ही हनुमान बेनीवाल को गंवा चुका है। जाट बेल्ट में जो मूड है, उसे लेकर बीजेपी को चिंता होनी ही चाहिए। मुझे उम्मीद है कि वे मूड सही से भांप पाएंगे।”

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