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Jat Mahasabha जानिये दो जाट महासभा में अंतर

Jat Mahasabha अखिल भारतवर्षीय जाट महासभा तथा अखिल भारतीय जाट महासभा स्थापना एवं अन्तर

देश व विदेश में कई जाट सभाएं Jat Mahasabha है जो समाज के लिए कार्य रही है । लेकिन देश में दो जाट महासभाएं Jat Mahasabha ऐसी है जो पुरानी है और एक जैसा नाम है जिसके कारण अक्‍सर लोग इन दोनों में अंतर नहीं कर पाते। आज हम आपको बताने जा रहे है ऐसी दो दो जाट महासभाओं के बारे में जो काफी पुरानी है नाम एक सा है लेकिन इनका इतिहास कुछ अलग सा है । तो चलिए जानते है जाट महासभा के बारे में

देश में सबसे पहली जिस महासभा का गठन किया गया था, उसका नामकरण हुआ था अखिल भारतवर्षीय जाट महासभा Akhil Bharatvarshiya Jat Mahasabha के रूप में। इस महासभा के गठन की औपचारिक घोषणा सन् 1907 में मुजफ्फरनगर उत्तर प्रदेश में सम्पन्न हुए जाट सम्मेलन में की गयी थी।

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अखिल भारतवर्षीय जाट महासभा Akhil Bharatvarshiya Jat Mahasabha, के पहले अध्यक्ष राजा दत्त प्रसाद सिंह मुरसान ( अलीगढ़) उप प्रधान राव बहादुर गिरिराज सिंह, कुचेसर और मंत्री कुंवर हुक्म सिंह, मथुरा थे।

सन् 1918 में अखिल भारतीय जाट महासभाAkhil Bharatiya Jat Mahasabha के महा अध्यक्ष (मुख्य संरक्षक) धौलपुर नरेश महाराणा सासब बहादुर तथा अध्यक्ष रायबहादुर चौ लालचंद जी फौगाट भालौठ बने।

दिनांक 28 व 29 मार्च 1925 को मेरठ के नौचन्दी मेले में आयोजित जाट सम्मेलन में कुंवर कल्याण सिंह रईस बरकातपुर, बुलन्दशहर को अध्यक्ष चुना गया जबकि कुंवर हुकम सिह रईस मथुरा को मंत्री चुना गया। इसके बाद सन् 1927 में गढमुक्तेश्वर में गंगा मेले पर जाट सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसमें कुंवर सरदार सिंह रईस मुरादाबाद को अध्यक्ष तथा कुंवर हुकम सिह रईस मथुरा को मंत्री चुना गया।

सन् 1935 में जालंधर शहर में आयोजित जाट सम्मेलन में चौ शिव ध्यान सिंह, पिशावा को अध्यक्ष तथा ठाकुर झम्मन सिंह जी को का महामंत्री (इस सभा में मंत्री पद का नाम महामंत्री किया गया था) नियुक्त किया गया था।
1938 में लायलपुर में सम्पन्न हुए अखिल भारतवर्षीय जाट महासभा के राष्ट्रीय सम्मेलन में सर शहाबुद्दीन ने चौधरी छोटूराम जी को रहबरे आजम की उपाधि से विभूषित किया।

इस समय तक संस्था के 11सभासद थे, जो निम्न प्रकार हैं-

दानवीर सेठ छाजूराम, दीनबन्धु सर छोटूराम, राय बहादुर लालों एडवोकेट, सदस्य पंजाब पब्लिक कमीशन, कुंवर कल्याण सिंह जी रईस बरकातपुर, बुलन्दशहर, डॉ भोपाल सिंह मेरठ, चौधरी रिसाल सिंह, पहाड़ी धीरज, दिल्ली, ठाकुर शिव ध्यान सिंह रईस पिसावा, अलीगढ़, स्वामी पदमदास, ठाकुर झम्मन सिंह एडवोकेट, दिल्ली, सरदार सुरेन्द्रपाल सिंह एडवोकेट, दिल्ली तथा सरदार रघुवीर सिंह, साँसी नरेश।

1945 में भरतपुर अधिवेशन में सरदार बलदेव सिंह को अध्यक्ष चुना गया।
1947 में भारत विभाजन का सभा के संगठन पर बहुत प्रभाव पड़ा और सभा के कई महत्वपूर्ण मुस्लिम और सिख सदस्य संगठन छोड़ गये। बलदेव सिंह की निष्क्रियता के कारण भरतपुर महाराज बृजेन्द्र सिंह को अध्यक्ष निर्वाचित किया गया।

1948 में मुरसान नरेश महेंद्र प्रताप सिंह जी की अध्यक्षता में सभा का 40वां सम्मेलन सोनीपत में सम्पन्न हूआ था। राजा महेंद्र प्रताप सिंह 32वर्ष की अपार साधना के बाद कुछ ही समय पहले विदेश से लौटे थे। इस अधिवेशन में महाराजा भरतपुर सवाई बृजेन्द्र सिंह जी ने स्वेच्छा से राजा महेंद्र प्रताप सिंह के लिए पद त्याग दिया। और राजा महेंद्र प्रताप सिंह सभा के अध्यक्ष चुने गये।
सन् 1956 के सम्मेलन में भी राजा महेंद्र प्रताप सिंह जी को पुनः अध्यक्ष चुना गया।

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1965 में सैदपुर, बुलन्दशहर में आयोजित जाट सम्मेलन में राजा महेंद्र प्रताप सिंह जी को पुनः अध्यक्ष और ठाकुर झम्मन सिंह एडवोकेट को महामंत्री चुना गया। 1966 में डेम्पियर पार्क मथुरा में आयोजित जाट सम्मेलन में भी राजा महेंद्र प्रताप सिंह जी को पुनः अध्यक्ष चुना गया और महामंत्री के रूप में चौधरी रामरिख बेनीवाल, जयपुर को महामंत्री नियुक्त किया गया।

साल 1969 में आयोजित जाट सम्मेलन में महाराजा भरतपुर सवाई बृजेन्द्र सिंह को अध्यक्ष तथा ठाकुर देशराज झगीना , राजस्थान को महामंत्री चुना गया। 1976 में राजा महेन्द्र प्रताप को पुनः अध्यक्ष बनाया चुना गया। 1979 में राजा महेन्द्र प्रताप के निधन के बाद चौधरी विरेन्द्र सिंह एडवोकेट को कार्यवाहक अध्यक्ष बनाया गया।

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1983 में मथुरा में आयोजित जाट सम्मेलन में कैप्टन भगवान सिंह फौजदार (पूर्व उच्चायुक्त) को अध्यक्ष तथा कमलेश भारतीय को महामंत्री चुना गया।
1991 के आगरा सम्मेलन में भरतपुर महाराज विश्वेंद्र सिंह को अध्यक्ष और चौधरी नेपाल सिंह चौहान, नैनीताल को महामंत्री चुना गया।

13 सितंबर 1998 को दिल्ली अधिवेशन में चौ दारा सिंह को अध्यक्ष और चौधरी युद्धवीर सिंह महिपालपुर को महामंत्री चुना गया। चौधरी दारा सिंह को स्थानापन्न कर 2008 में दिल्ली के पूर्व चीफ कमिश्नर वीरेन्द्र सिंह (आईएएस) को महाराजा विश्वेन्द्र सिंह द्वारा नया अध्यक्ष मनोनीत किया गया। चौ वीरेन्द्र सिंह द्वारा गठित नयी कार्यकारिणी में अब तक के महासचिव युद्ध बीर सिंह के स्थान पर पूर्व केंद्रीय मंत्री सोमपाल शास्त्री जी के छोटे भाई देवपाल सिंह जी को महासचिव चुना गया।

इसके उपरांत युद्ध बीर सिंह आदिे ने अखिल भारतवर्षीय जाट महासभा के नाम से हू-ब-हू मेल खाते हुए नाम अखिल भारतीय जाट महासभा का पंजीकरण कराया। यद्यपि इस प्रकार के मिलते-जुलते नाम से पंजीकरण होना सम्भव नहीं था, लेकिन दिल्ली के ख्यात जाट राजनेता स्व दीपचंद बन्धु के माध्यम से यह संस्था अस्तित्व में आयी। चौ दारा सिंह जी को ही इस नवीन संस्था का अध्यक्ष मनोनीत किया गया। देश के मुश्किल से एक दर्जन जाटों को छोड़कर किसी को कानों कान भी खबर न हो सकी कि दूसरी जाट महासभा कब अस्तित्व में आ गयी।

पता नहीं क्यों नयी जाट महासभा द्वारा आम जन को कभी भी इस सम्बन्ध में कुछ नहीं बताया गया। (आज तक भी आम जाट को इन दोनों संस्थाओं के लगभग एक से नामों के अन्तर और इन दोनों संस्थाओं के इतिहास के विषय में कोई जानकारी नहीं है। अधिकांश लोगों को यही पता है कि अखिल भारतीय जाट महासभा ही वह संस्था है जो पहले से चलती आ रही है।

यहां यह ध्यान देने योग्य है कि अखिल भारतवर्षीय जाट महासभा Akhil Bharatvarshiya Jat Mahasabha नाम केवल लिखने तक ही सीमित था, वरन् तो लोग बोलने की आसानी के कारण इसे अखिल भारतीय जाट महासभा Akhil Bharatiya Jat Mahasabha ही कह कर पुकारते थे। यानी जब उनकी जुबान पर चढ़ा नाम, वही पहले से कार्यरत अध्यक्ष और वही महामंत्री, वही कार्यकारिणी-सब कुछ वही पहले जैसा था, तो लोग स्वाभाविक रूप से नयी संस्था को ही मूल संस्था मान बैठे।)

चौ दारा सिंह जी के निधन के बाद अखिल भारतीय जाट महासभा की बागडोर पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय सिंह जी को सौंपी गयी। मावलंकर हाल में सम्पन्न हुए अखिल भारतीय जाट महासभा के सम्मेलन में जाट समाज के स्तम्भों-पूर्व लोकसभा अध्यक्ष डॉ बलराम जाखड, पूर्व केंद्रीय विदेश मंत्री चौ नटवर सिंह, तत्कालीन मुख्यमंत्री हरियाणा चौ भूपेन्द्र हुड्डा, पूर्व सासंद हरेन्द्र मलिक, पूर्व राज्यपाल चन्द्रवती आदि की उपस्थिति में चौ अजय सिंह जी को महासभा का स्थायी राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित कर दिया गया।

किन्तु महासभा के राष्ट्रीय महासचिव युद्ध बीर सिंह और चौ अजय सिंह जी के बीच कुछ मतभेद होने के कारण 12 मई 2013 को शिमला में प्रदेश जाट सभा अध्यक्षों के माध्यम से पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को अध्यक्ष घोषित कर दिया।

वर्तमान में दो जाट महासभाए कार्यरत हैं-1907 में गठित अखिल भारतवर्षीय जाट महासभा जिसकी अध्यक्षता चौ वीरेन्द्र सिंह पूर्व आईएएस ने की थी। तो 2008 में गठित अखिल भारतीय जाट महासभा की अध्यक्षता कैप्टेन अमरेन्दर सिंह कर रहे हैं।

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दीपक पूनिया को मिली अस्पताल से छुट्टी
दीपक पूनिया
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कोरोना वायरस तेजी से फैल रहा है जिसके कारण खि लाड़ी भी इसकी चपेट में आ तेजी से आने लगे है। हाल ही में इसकी गिरफ्त में आए विश्व चैम्पियनशिप में रजत पदक हासिल करने वाले पहलवान दीपक पूनिया। कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव होने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती किया गया जहां से उनकी स्थिति में सुधार होने के बाद उन्हें छुट्टी दे दी गई है।

दीपक पूनिया के साथ साथ नवीन और कृष्ण पहलवान भी कोरोना वायरस की चपेट में आए थे जिसके बाद सभी को सावधानी के तौर पर अस्पताल में भर्ती कर दिया गया था।

आपको बता दें कि कोरोना वायरस का तेजी से दायरा बढ रहा है लेकिन एक लंबें लॉकडाउन के बाद धीरे धीरे सभी चीजें खुलने लगी है। इसी कड़ी सोनीपत के भारतीय खेल प्राधिकरण के केंद्र में राष्ट्रीय शिविर लगाया गया था जहां ये तीनों हिस्सा लेने पहुंचे थे।

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लेकिन साइ के लॉकडाउन गाइडलाइन के अनुसार पहलवानों को शिविर में हिस्सा लेने से पहले कुछ समय पृथकवास में रहना होता है। जहां उनका कोरोना टेस्ट किया जाता है ये तीनों पहलवान उसी में कोरोना संक्रमित पाए गए। तभी उन्हें इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती किया गया था।

इस संबंध में साइ ने ट्वीट करते हुए कहा कि राष्ट्रीय शिविर के लिए सोनीपत पहुंचे पर साइ के परीक्षण में पहलवान दीपक पूनिया पॉजिटिव पाए गए थे और अस्पताल में भर्ती किया गया था।

अब डॉक्टरों ने उन्हें कुछ समय के लिए पृथकवास में रहने की सलाह दी है क्योंकि उनमें किसी प्रकार का कोई लक्षण नजर नहीं आ रहा है लेकिन सावधानी के तौर पर उन्हें कुछ समय के लिए अपने आपको कोरोनटाइन करना होगा। हालांकि उन्हें घर पर रहने की इजाजत दे दी गई है।

विश्व चैंपियनशिप में रजत पदक जीतने वाले पूनिया तोक्यो ओलंपिक के लिए क्वालीफाई कर चुके हैं। वायरस के लिए पॉजिटिव पाए जाने के बाद इस पहलवान को आगे के निरीक्षण के लिए एहतियात के तौर पर अस्पताल में भर्ती किया गया था।

नियमों के अनुसार शिविर के लिए पहुंचने पर सभी कोचों और सहयोगी स्टाफ के साथ पहलवानों का अनिवार्य आरटी-पीसीआर परीक्षण किया गया था जिससे कि कोविड-19 संक्रमण का पता चल सके। सभी पहलवान शिविर के लिए एक सितंबर को एकत्रित हुए थे।

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इससे पहले एशियाई और राष्ट्रमंडल खेलों की चैंपियन विनेश फोगाट कोरोना वायरस पॉजिटिव पाई गई थीं जिसके कारण वह खेल रत्न पुरस्कार भी नहीं ले पाई थी। विनेश तोक्यो ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करने वाली एकमात्र भारतीय महिला पहलवान है। बाद में विनेश ने ट्वीट किया था कि वह इस संक्रमण से उबर गई हैं और परीक्षण में दो बार नेगेटिव पाई गई हैं।

अनपढ़ jaat पढ़ा जैसा, पढ़ा jaat जाट खुदा जैसा
jaat
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jaat समजा में पंचायते बहुत समय से चलती आ रही है जो कि गांव में न्‍याय करने के लिए काफी प्रसिद्ध है। ये पंचायत कभी कभी ऐसा न्‍याय कर जाती है जो कि कहावत का रूप धारण कर लेती है ऐसी ही एक कहावत है अनपढ़ jaat पढ़ा जैसा, पढ़ा jaat जाट खुदा जैसा जिससे जाटों की समझदारी का पता चलता है तो आईये जानते है आखिर इस कहावत के पीछे क्‍या सच्‍चाई है और यह क्‍यों प्रसिद्ध हुई।

jaat यह घटना सन् 1270-1280 के बीच की है । दिल्ली में बादशाह बलबन का राज्य था । उसके दरबार में एक अमीर दरबारी था ।जिसके तीन बेटे थे । उसके पास उन्नीस घोड़े भी थे । मरने से पहले वह वसीयत लिख गया था कि इन घोड़ों का आधा हिस्सा… बड़े बेटे को, चौथाई हिस्सा मंझले को और पांचवां हिस्सा सबसे छोटे बेटे को बांट दिया जाये ।

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बेटे उन 19 घोड़ों का इस तरह बंटवारा कर ही नहीं पाये और बादशाह के दरबार में इस समस्या को सुलझाने के लिए अपील की । बादशाह ने अपने सब दरबारियों से सलाह ली पर उनमें से कोई भी इसे हल नहीं कर सका । उस समय प्रसिद्ध कवि अमीर खुसरो बादशाह का दरबारी कवि था ।

उसने जाटों की भाषा को समझाने के लिए एक पुस्तक भी बादशाह के कहने पर लिखी थी जिसका नाम “खलिक बारी” था । खुसरो ने कहा कि मैंने जाटों के इलाक़े में खूब घूम कर देखा है और पंचायती फैसले भी सुने हैं और सर्वखाप पंचायत का कोई पंच ही इसको हल कर सकता है ।

नवाब के लोगों ने इन्कार किया कि यह फैसला तो हो ही नहीं सकता..! परन्तु कवि अमीर खुसरो के कहने पर बादशाह बलबन ने सर्वखाप पंचायत में अपने एक खास आदमी को चिट्ठी देकर गांव-अवार (जिला- भरतपुर) राजस्थान भेजा (इसी गांव में शुरू से सर्वखाप पंचायत का मुख्यालय चला आ रहा है और आज भी मौजूद है) ।

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चिट्ठी पाकर पंचायत ने प्रधान पंच चौधरी रामसहाय सूबेदार को दिल्ली भेजने का फैसला किया। चौधरी साहब अपने घोड़े पर सवार होकर बादशाह के दरबार में दिल्ली पहुंच गये और बादशाह ने अपने सारे दरबारी बाहर के मैदान में इकट्ठे कर लिये ।

वहीं पर 19 घोड़ों को भी लाइन में बंधवा दिया । चौधरी रामसहाय ने अपना परिचय देकर कहना शुरू किया – “शायद इतना तो आपको पता ही होगा कि हमारे यहां राजा और प्रजा का सम्बंध बाप-बेटे का होता है और प्रजा की सम्पत्ति पर राजा का भी हक होता है ।

इस नाते मैं जो अपना घोड़ा साथ लाया हूं, उस पर भी राजा का हक बनता है । इसलिये मैं यह अपना घोड़ा आपको भेंट करता हूं और इन 19 घोड़ों के साथ मिला देना चाहता हूं, इसके बाद मैं बंटवारे के बारे में अपना फैसला सुनाऊंगा ।” बादशाह बलबन ने इसकी इजाजत दे दी और चौधरी साहब ने अपना घोड़ा उन 19 घोड़ों वाली कतार के आखिर में बांध दिया, इस तरह कुल बीस घोड़े हो गये ।

अब चौधरी ने उन घोड़ों का बंटवारा इस तरह कर दिया-आधा हिस्सा (20 ¸ 2 = 10) यानि दस घोड़े उस अमीर के बड़े बेटे को दे दिये । चौथाई हिस्सा (20 ¸ 4 = 5) यानि पांच घोडे मंझले बेटे को दे दिये ।

पांचवां हिस्सा (20 ¸ 5 = 4) यानि चार घोडे छोटे बेटे को दे दिये । इस प्रकार उन्नीस (10 + 5 + 4 = 19) घोड़ों का बंटवारा हो गया । बीसवां घोड़ा चौधरी रामसहाय का ही था जो बच गया ।
बंटवारा करके चौधरी ने सबसे कहा – “मेरा अपना घोड़ा तो बच ही गया है, इजाजत हो तो इसको मैं ले जाऊं ?” बादशाह ने हां कह दी और चौधरी साहब का बहुत सम्मान और तारीफ की । चौधरी रामसहाय अपना घोड़ा लेकर अपने गांव सौरम की तरफ कूच करने ही वाले थे, तभी वहां पर मौजूद कई हजार दर्शक इस पंच के फैसले से गदगद होकर नाचने लगे और कवि अमीर खुसरो ने जोर से कहा – “अनपढ़ जाट पढ़ा जैसा, पढ़ा जाट खुदा जैसा”। सारी भीड़ इसी पंक्ति को दोहराने लगी । तभी से यह कहावत हरियाणा, पंजाब, राजस्थान व उत्तरप्रदेश तंथा दूसरी जगहों पर फैल गई । यहां यह बताना भी जरूरी है कि 19 घोड़ों के बंटवारे के समय विदेशी यात्री और इतिहासकार इब्नबतूता भी वहीं दिल्ली दरबार में मौजूद था । यह वृत्तांत सर्वखाप पंचायत के अभिलेखागार में मौजूद है।

jat regiment का हुआ विस्‍तार, 24 वीं बटालियन बनेगी

जाट रेजीमेंट jat regiment का इतिहास दो सौ साल पुराना है। इस दो सौ साल पुराने इतिहास में सितम्बर 2020 को एक और अध्याय जुड़ गया। जी हां अब तक जाट रेजीमेंट jat regiment में 23 बटालियन हुआ करती थी लेकिन अब 24 वीं बटालियन के उदय की भी घोषणा कर दी गई है। एक समारोह के दौरान थल सेना उपाध्यक्ष एवं कर्नल ऑफ द जाट रेजिमेंट लेफ्टिनेंट जनरल एमके सैनी ने ध्वज फहराकर 24 वीं जाट बटालियन की औपचारिक घोषणा की।

जाट रेजीमेंट
जाट रेजीमेंट भारत के इतिहास की सबसे पुरानी और सबसे बहादुर रेजीमेंट है।

आपको बता दें कि जाट रेजिमेंट भारत के इतिहास की सबसे पुरानी रेजिमेंट है। इसके साथ ही साथ इसने जितने पुरस्कार प्राप्त किए है उतने किसी भी दूसरी रेजिमेंट ने नहीं प्राप्त किए है।

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इस बटालियन में 800 जवानों को शामिल किया गया है। सभी जवानों को एक सितम्बर को देश सेवा और बलिदान का संकल्प दिलाया गया। आपको बता दें कि जाट रेजीमेंट अटूट बल और अद्भुत युद्ध कौशल की मिसाल के तौर पर देखी जाती है। जब देश की रक्षा के लिए किसी ऐसे कार्य के लिए बटालियन को भेजना होता है जिससे करना लगभग असंभव हो तो उस समय जाट रेजिमेंट को ही भेजा जाता है। और इस भरोसे पर जाट रेजीमेंट खरी उतरती है। आपको बता दें कि हाल ही में चीनी सैनिकों ने जब भारतीय सैनिकों पर हमला किया जिसमें हमारे कई जवान घायल हो गए तो सरकार ने एक बार फिर इसी जाट रेजिमेंट पर भरोसा जताया और उसे सरहद पर भेजा।
जाट रेजीमेंट का युद्ध नारा जाट बलवान, जय भगवान है जिससे जाट रेजीमेंट का मुख्यालय बरेली में गूंज उठा।

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उन्होंने इसके बाद जवानों को संबोधित करते हुए भारतीय सेना के लोकाचार का महत्व बताया और सैनिकों से मातृभूमि की सेवा के लिए भविष्य के निर्धारित लक्ष्यों को पूरा करने के लिए मजबूत नींव तैयार करने का जोश भरा। 24 जाट नियमित बटालियन के तौर पर काम करेगी।

समारोह में जाट रेजिमेंट के गौरवशाली इतिहास का उल्लेख भी किया गया। बता दें कि जाट वीरों ने रेजिमेंट की स्थापना के बाद कई लड़ाइयों में अपने अदम्य साहस और शौर्य से दुश्मनों के दांत खट्टे कर गौरवशाली इतिहास लिखा है।